ज़कात: फ़र्ज़-ए-इलाही, अमानत-ए-माल और इस्लामी सामाजिक व्यवस्था का मज़बूत स्तंभ - सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी
जयपुर, राजस्थान।
रमज़ानुल मुबारक के दूसरे जुमा पर नूरी जामा मस्जिद में आयोजित जुमे के ख़ुत्बे में ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन के चेयरमैन एवं चीफ़ क़ाज़ी, हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने ज़कात की अहमियत को क़ुरआन व सुन्नत की रौशनी में विस्तार से बयान किया। उन्होंने कहा कि ज़कात कोई वैकल्पिक दान नहीं, बल्कि इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक अनिवार्य फ़र्ज़ है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि जिस तरह नमाज़ बदन की इबादत है, उसी तरह ज़कात माल की इबादत है और दोनों मिलकर बंदे के ईमान को मुकम्मल करती हैं।
*ज़कात: तज़किया-ए-माल और तज़किया-ए-नफ़्स*
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने स्पष्ट किया कि ज़कात का असली मक़सद माल को पाक करना और दिल को बुख़्ल से साफ़ करना है। उन्होंने कहा कि ज़कात देने से माल कम नहीं होता, बल्कि अल्लाह तआला उसकी बरकत में इज़ाफ़ा फ़रमाता है। यह क़ुरआन व हदीस की स्पष्ट शिक्षा है। उन्होंने यह भी बताया कि ज़कात की अदायगी शरई शर्तों, निसाब का पूरा होना, एक साल का गुज़रना और सही हिसाब के साथ ही मान्य होती है।
*असली हक़दार वही, जिन्हें शरीअत ने मुक़र्रर किया*
अपनी तक़रीर में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने विशेष रूप से स्पष्ट किया कि ज़कात के हक़दार वही लोग हैं जिनका उल्लेख क़ुरआन करीम (सूरह अत-तौबा, आयत 60) में किया गया है। उन्होंने कहा कि ज़कात का वितरण व्यक्तिगत पसंद या सामाजिक दबाव के आधार पर नहीं, बल्कि शरीअत के अनुसार होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि ज़कात मुस्लिम फ़ुक़रा व मसाकीन सहित उन श्रेणियों के लिए है जिन्हें इस्लामी कानून ने निर्धारित किया है और इसमें शरई हिदायतों की पूर्ण पाबंदी अनिवार्य है।
*राहत के साथ, शरई अमानत की अदायगी*
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि ज़कात को केवल भावनात्मक अपील का विषय न बनाया जाए, बल्कि इसे शरई ज़िम्मेदारी समझकर अदा किया जाए।
उन्होंने कहा, ज़कात एहसान नहीं, बल्कि हक़ की अदायगी है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि ज़कात देते समय नियत की पवित्रता, सही पात्र की पहचान तथा प्रत्यक्ष या विश्वसनीय माध्यम से सुपुर्दगी अत्यंत आवश्यक है।
*ज़कात की पाबंदी में बरकत*
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने हदीस का हवाला देते हुए कहा कि जब माल का हक़ अदा किया जाता है तो समाज में बरकत, राहत और आपसी हमदर्दी बढ़ती है। उन्होंने कहा, जहां अमानत का एहसास होगा, वहीं अल्लाह की रहमत नाज़िल होगी।
*जवाबदेही और तक़वा*
तक़रीर के अंत में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने साहिबे-निसाब मुसलमानों से अपील की कि वे अपने माल का सही हिसाब रखें
निसाब और शरई शर्तों की सही जानकारी हासिल करें। ज़कात को टालने के बजाय समय पर अदा करें। दिखावे से बचें और इख़लास को प्राथमिकता दें। उन्होंने कहा कि क़यामत के दिन इंसान से उसके माल के बारे में सवाल किया जाएगा। समझदारी इसी में है कि इंसान दुनिया ही में अपना फ़र्ज़ अदा कर ले।
*समापन संदेश*
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने दुआ के साथ अपनी तक़रीर का समापन करते हुए कहा कि ज़कात की सही और मुकम्मल अदायगी ही माल की हिफ़ाज़त, दिल की सफ़ाई और आख़िरत की कामयाबी का ज़रिया है। तक़रीर के बाद उन्होंने जुमा का ख़ुत्बा पढ़ा, जुमा की नमाज़ पढ़ाई और सेहत व सलामती के लिए दुआएं करते हुए, देश में अमन-चैन और भाईचारा के लिए भी दुआएं मांगी।
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