रमज़ान किरदार, करुणा और क़ौमी बेदारी का बिगुल - सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी
भूख नहीं, बुराइयों के ख़िलाफ़ जंग है रोज़ा। तक़वा और इंसाफ़ का संदेश।
नौजवानों, उलेमा और अवाम से एकजुट होकर समाज-निर्माण का आह्वान।
भारत समाचार न्यूज एजेंसी
जयपुर, राजस्थान।
रमज़ान के मुबारक महीने के पहले जुमा के अवसर पर, नूरी जामा मस्जिद में उमड़े अक़ीदतमंदों के विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए, हमदर्दे क़ौम व मिल्लत, हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी, चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी – ग़ौसे आज़म फाउंडेशन ने एक अत्यंत प्रभावशाली और भावनात्मक तक़रीर पेश की, जिसने उपस्थित लोगों के दिलों में आत्म-मंथन और सामाजिक उत्तरदायित्व की नई लौ जला दी। अपने संबोधन में उन्होंने पवित्र कुरआन की आयत का उल्लेख करते हुए कहा कि रमज़ान केवल भूख-प्यास का अभ्यास नहीं, बल्कि आत्मा की तज़किया, चरित्र की शुद्धि और समाज के प्रति संवेदनशीलता का प्रशिक्षण है। उन्होंने कहा कि यदि रमज़ान के बाद भी हमारी आदतों, व्यवहार और लेन-देन में ईमानदारी न आए, तो हमने इस पवित्र महीने की रूह को नहीं समझा। रमज़ान हमें संयम, सहानुभूति और त्याग की शिक्षा देता है। यह महीना इंसान को अपने अंदर झांकने, अपनी कमज़ोरियों को पहचानने और उन्हें दूर करने का अवसर देता है।
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने विशेष रूप से नौजवानों को संबोधित करते हुए कहा कि वे रमज़ान को केवल औपचारिकता न बनने दें, बल्कि इसे जीवन की दिशा बदलने का माध्यम बनाएं। उन्होंने कुरआन से जुड़ने, माता-पिता की सेवा करने, समाज में नैतिक मूल्यों को मज़बूत करने और ग़रीबों, यतीमों, विधवाओं की सहायता को प्राथमिकता देने का आह्वान किया। उन्होंने यह भी कहा कि इफ़्तार की सादगी और हक़ीक़ी ज़रूरतमंदों की मदद ही रमज़ान की असली रूह है। यदि किसी मोहल्ले में कोई भूखा सो जाए, तो यह हम सबकी सामूहिक ज़िम्मेदारी है।
तक़रीर के अंत में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने दुआ करते हुए कहा कि यह रमज़ान हर घर में अमन, हर दिल में करुणा और हर समाज में एकता का संदेश लेकर आए। नूरी जामा मस्जिद “ आमीन ” की सदाओं से गूंज उठी और उपस्थित लोगों ने अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का संकल्प लिया।
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