रमज़ान केवल रोज़े का महीना नहीं, बल्कि आत्मसंयम, सेवा और इतिहास से प्रेरणा लेने का संदेश देता है - सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी
जंग-ए-बद्र का सबक़, संख्या नहीं, सच्चाई और सब्र की ताक़त बड़ी होती है।
भारत समाचार न्यूज एजेंसी
जयपुर, राजस्थान।
हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी (चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी – ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन) ने अपने प्रभावशाली अंदाज़ में नूरी जामा मस्जिद में तक़रीर करते हुए कहा कि रमज़ान का महीना केवल इबादत का नहीं, बल्कि इंसान के अंदर आत्मसंयम, करुणा, सामाजिक ज़िम्मेदारी और अल्लाह पर भरोसे की भावना को मज़बूत करने का महीना है। उन्होंने कहा कि इस पवित्र महीने में इस्लामी इतिहास की महान घटना जंग-ए-बद्र भी हुई, जिसने पूरी दुनिया को यह संदेश दिया कि जब इंसान सच्चाई, न्याय और धैर्य के साथ खड़ा होता है तो अल्लाह की मदद उसके साथ होती है।
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि क़ुरआन में भी बद्र की घटना का उल्लेख मिलता है। अल्लाह तआला फरमाता है और निश्चय ही अल्लाह ने बद्र में तुम्हारी मदद की, जबकि उस समय तुम कमज़ोर थे। इसलिए अल्लाह से डरते रहो ताकि तुम शुक्रगुज़ार बनो। उन्होंने कहा कि यह आयत इंसान को यह भरोसा देती है कि कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद और सब्र नहीं छोड़ना चाहिए।
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि रोज़ा इंसान को केवल भूख और प्यास का एहसास नहीं कराता, बल्कि यह दिल में रहमदिली और समाज के कमज़ोर लोगों के प्रति संवेदनशीलता भी पैदा करता है। यही कारण है कि रमज़ान में ज़कात, सदक़ा और इंसानी सेवा की परंपरा विशेष रूप से बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि रमज़ान का असली संदेश यही है कि इंसान अपने अंदर की बुराइयों को छोड़कर अच्छाई, संयम और इंसानियत को अपनाए। जब समाज में नैतिकता और आपसी सम्मान बढ़ता है, तो अमन और भाईचारा भी मज़बूत होता है। तक़रीर के दौरान उन्होंने एक मशहूर शेर पढ़ते हुए कहा यक़ीं मोहकम, अमल पैहम, मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलम
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सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि आज के दौर में इंसान को इतिहास से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में ईमानदारी, संयम और सेवा की भावना को अपनाना चाहिए। यही वह रास्ता है जो समाज में अमन, स्थिरता और सकारात्मकता को मज़बूत करता है।
अंत में उन्होंने दुआ करते हुए कहा कि रमज़ान का यह पवित्र महीना इंसानों के दिलों में रहमत, इंसानियत और भाईचारे की भावना को मज़बूत करे और देश में शांति, सद्भाव और तरक़्क़ी क़ायम रहे।
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