मुस्लिम प्रतिनिधित्व को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए, हर समुदाय का प्रतिनिधित्व ही मजबूत लोकतंत्र की पहचान है।

द्वारा: रेयाज़ आलम
सीनियर कॉर्पोरेट प्रोफेशनल एवं सामाजिक कार्यकर्ता
अध्यक्ष (पूर्वी क्षेत्र), ह्यूमन राइट्स जस्टिस काउंसिल
नई दिल्ली।
भारत की लोकतांत्रिक शक्ति हमेशा समावेशी भागीदारी, संवैधानिक मूल्यों और समाज के सभी वर्गों के समान प्रतिनिधित्व पर आधारित रही है। लेकिन प्रतिनिधिक राजनीति में मुसलमानों के बढ़ते राजनीतिक हाशियाकरण ने लोकतांत्रिक विमर्श की दिशा पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
हालिया राजनीतिक रुझान यह संकेत देते हैं कि चुनावी और शासन संरचनाओं में मुसलमानों की घटती भागीदारी को धीरे-धीरे सामान्य बनाया जा रहा है। यद्यपि राजनीतिक दलों को अपनी चुनावी रणनीति तय करने का अधिकार है, लेकिन जब किसी बड़े समुदाय को यह महसूस होने लगे कि उसे मुख्यधारा की राजनीति से लगातार दूर किया जा रहा है, तब लोकतंत्र कमजोर होने लगता है।
साथ ही यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि मुसलमानों के मुद्दों और चिंताओं की आवाज़ उठाने की जिम्मेदारी केवल एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं होनी चाहिए। एक स्वस्थ लोकतंत्र की मांग है कि सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दल हर समुदाय को राष्ट्र निर्माण में समान भागीदार मानें।
पश्चिम बंगाल सहित विभिन्न राज्यों में केवल पहचान-आधारित मुस्लिम राजनीति करने वाली पार्टियों की लगातार चुनावी असफलताएँ यह स्पष्ट करती हैं कि भारतीय मुसलमान अलगाववादी या सीमित राजनीति नहीं चाहते। वे भी अन्य भारतीयों की तरह सम्मान, समान अवसर, शिक्षा, रोजगार, न्याय और संवैधानिक सुरक्षा चाहते हैं।
मुसलमानों की राजनीतिक भागीदारी को केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व, चुप्पी या सीमित राजनीतिक दायरे तक सीमित करना एक खतरनाक लोकतांत्रिक अलगाव को जन्म दे सकता है। किसी भी समुदाय का राजनीतिक घेट्टोकरण अंततः सामाजिक सौहार्द को कमजोर करता है और भारतीय संविधान की समावेशी भावना के विरुद्ध जाता है।
प्रतिनिधित्व को तुष्टिकरण या सांप्रदायिक संदेह के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे विश्वास, सहभागिता और राष्ट्रीय एकता के लिए एक लोकतांत्रिक आवश्यकता के रूप में समझा जाना चाहिए।
भारत का भविष्य चयनात्मक समावेशन पर नहीं, बल्कि ऐसी राजनीतिक संस्कृति पर निर्भर करता है जहाँ हर नागरिक — चाहे उसका धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र कुछ भी हो — स्वयं को सुना गया, देखा गया और प्रतिनिधित्व प्राप्त महसूस करे।
ऐसे समय में जब ध्रुवीकरण संवाद पर हावी होने की कोशिश कर रहा है, देश को परिपक्व नेतृत्व, संवैधानिक प्रतिबद्धता और ऐसी समावेशी राजनीति की आवश्यकता है जो लोकतंत्र को मजबूत करे, समाज को विभाजित नहीं।

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