खोया-पाया केंद्र' और पुलिस की मुस्तैदी से 100 से अधिक बिछड़े अपनों को मिली नई मुस्कान, बनी इंसानियत की अनूठी मिसाल।
खंडवा, मध्य प्रदेश।
दादाजी धूनीवाले के पावन मेले का उल्लास, चारों तरफ गूंजती आस्था की स्वर-लहरियाँ और लाखों श्रद्धालुओं का विशाल जनसैलाब—इस आध्यात्मिक उल्लास के बीच मेले का एक कोना ऐसा भी था जहाँ कुछ पलों के लिए धड़कनें थम जाती हैं और आँखें आंसुओं से भर जाती हैं। यह दर्द होता है उस अपार भीड़ में अपनों से बिछड़ जाने वाले बच्चों, माताओं और बुजुर्गों का।
लेकिन, इस पैनिक और बेचैनी के माहौल में आशा की एक मजबूत किरण बनकर चमका दादाजी मंदिर के गेट नंबर 01 पर स्थापित 'खोया-पाया केंद्र'। 'मानव अधिकार सेवा समिति संगठन भारत' (शाखा खंडवा) और पुलिस प्रशासन के अद्भुत समन्वय ने इस केंद्र को महज़ एक काउंटर नहीं, बल्कि अपनों को मिलाने का एक बड़ा जरिया बना दिया।
"कोई भी बच्चा अपने मां-बाप से न बिछड़े" — दृढ़ संकल्प के साथ उतरी टीम
मेले के दौरान जब भीड़ अपने चरम पर थी, तब कई परिवार अपनों के बिछड़ने के गम से बेहाल थे। ऐसे विकट समय में केंद्र पर मौजूद टीम का मूल मंत्र एक ही था— "कोई भी बच्चा अपने मां-बाप से न बिछड़े।"
मानव अधिकार सेवा समिति के जिलाध्यक्ष रजाक खान और किशोर पुलिस इकाई की तेज-तर्रार अधिकारी सुनीता जोसेफ मैडम के कुशल मार्गदर्शन में इस अभियान को चलाया गया। दिन-रात की कड़ी मेहनत और त्वरित कार्रवाई का ही परिणाम था कि मेले में छूटे 100 से अधिक बालकों, बालिकाओं, माताओं और बुजुर्गों को सकुशल उनके रोते-बिलखते परिजनों से मिलाया गया।
इन कर्मठ योद्धाओं ने दिन-रात एक कर संभाला मोर्चा
इस पुनीत और संवेदनशील कार्य को सफलता की ऊंचाइयों तक पहुँचाने में टीम के हर सदस्य ने पूरी निष्ठा के साथ जिम्मेदारी निभाई:
* प्रमुख नेतृत्व: सुनीता जोसेफ मैडम (अधिकारी, किशोर पुलिस इकाई) एवं रजाक खान (जिला अध्यक्ष, मानव अधिकार सेवा समिति)
* सहयोगीयों की टीम: अजु चौहान, गितांजली, और विधा सपकडे़ (लेखाकार)
* समर्पित वालंटियर: खुशी रायकवार, ऋषि, निहारिका, और राखी
इन सभी ने मिलकर न केवल लाउडस्पीकर से लगातार अनाउंसमेंट किए, बल्कि डरे-सहमे बच्चों को चॉकलेट-पानी देकर संभाला और तुरंत सर्चिंग कर उन्हें उनके परिवारों तक पहुँचाया।
जब अविश्वास और डर की जगह ले ली दुआओं ने
अपनों के बिछड़ने का दर्द वही माता-पिता जानते हैं जिनके कलेजे का टुकड़ा भीड़ में ओझल हो जाता है। जब वे दौड़ते-भागते गेट नं. 01 स्थित इस केंद्र पर पहुंचते, तो उनके होंठ कांप रहे होते थे। लेकिन यहाँ की टीम का आत्मीय व्यवहार और तत्परता देखकर उनके मुरझाए चेहरों पर जो सुकून लौटता था, वह अभूतपूर्व था।
भावुक हुए एक परिजन ने रोते हुए साझा किया—
> "हम तो डर के मारे सुन्न हो गए थे कि हमारा बच्चा इस विशाल मेले में कहाँ मिलेगा! लेकिन गेट नंबर 01 के खोया-पाया केंद्र की टीम हमारे लिए फरिश्ता बनकर आई। हम ताउम्र आपका यह अहसान नहीं भूलेंगे।"
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प्रशासनिक समन्वय और जनसेवा का बेहतरीन संगम
यह पूरा अभियान इस बात का प्रमाण है कि जब खाकी (पुलिस प्रशासन) और सामाजिक संगठन हाथ मिला लेते हैं, तो किसी भी बड़े आयोजन को कितना सुरक्षित और मानवीय बनाया जा सकता है। यह सफलता सिर्फ एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज के हर उस इंसान के लिए एक प्रेरणा है जो मानवता के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा रखता है।
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