बिहार में साहित्य, संस्कृति और समाज पर सूफी-भक्ति आंदोलन के प्रभाव पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन।


शहनवाज अता 
पटना हाजीपुर (वैशाली, बिहार।
बिहार के साहित्य, संस्कृति और समाज पर सूफी-भक्ति आंदोलन के प्रभाव तथा उसके सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक योगदान पर शोध एवं विमर्श के उद्देश्य से खुदाबख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
उद्घाटन सत्र में लाइब्रेरी के निदेशक प्रो. मोहम्मद जाहिदुल हक़ ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि उनके कार्यभार संभालने के केवल एक महीने के भीतर इस प्रकार की महत्वपूर्ण संगोष्ठी का आयोजन होना उनके लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने कहा कि खुदाबख्श लाइब्रेरी एक बार फिर अपनी गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ा रही है, जो अत्यंत शुभ संकेत है।
प्रसिद्ध कथाकार एवं कवि शफी मशहदी ने संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए कहा कि लंबे समय बाद लाइब्रेरी को एक ऊर्जावान और सक्रिय नेतृत्व मिला है। उन्होंने कहा कि यह संगोष्ठी आने वाले समय की नई योजनाओं का संकेत है और इसकी शुरुआत ऐसे विषय से हुई है जिसने समाज को आपसी भाईचारा और सद्भाव का संदेश दिया।
प्रख्यात साहित्यकार एवं चिंतक प्रो. सफदर इमाम कादरी ने मुख्य वक्तव्य देते हुए कहा कि इतिहासकारों के सामने यह महत्वपूर्ण प्रश्न है कि सूफी-भक्ति आंदोलन के उपलब्ध ग्रंथों पर कितना भरोसा किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि विद्यापति के ग्रंथ अपेक्षाकृत प्रमाणिक हैं, लेकिन अमीर खुसरो और कबीर के कई ग्रंथों की प्रामाणिकता आज भी शोध का विषय है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि वर्तमान पीढ़ी के इतिहासकार और शोधकर्ता इस चुनौती का समाधान अवश्य खोजेंगे।
वरिष्ठ इतिहासकार प्रो. रत्नेश्वर मिश्र ने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि सूफी-भक्ति आंदोलन की जड़ें भले ही प्राचीन हों, लेकिन इसका उत्कर्ष 16वीं शताब्दी में हुआ। इस आंदोलन ने जनभाषाओं को सम्मान दिलाया और क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि विद्यापति ने मैथिली भाषा को प्रतिष्ठा दिलाई, जबकि शेख शरफुद्दीन याह्या मनेरी की रचनाओं ने आध्यात्मिक चिंतन को नई ऊँचाई प्रदान की।
बिहार सरकार के अतिरिक्त सचिव नदीमुल गफ्फार सिद्दीकी ने सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि वर्तमान डिजिटल युग में सभी ऐतिहासिक ग्रंथों का डिजिटलीकरण आवश्यक है, ताकि उनका व्यापक उपयोग और संरक्षण सुनिश्चित हो सके।
बिहार लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष इम्तियाज अहमद करीमी ने कहा कि सूफी-भक्ति आंदोलन का भारत, विशेषकर बिहार के साहित्य, संस्कृति और समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा है। यह आंदोलन मनुष्य को आध्यात्मिकता के माध्यम से ईश्वर के निकट ले जाने का कार्य करता है।
गवर्नमेंट उर्दू लाइब्रेरी के पूर्व अध्यक्ष अरशद फिरोज़ ने कहा कि खुदाबख्श लाइब्रेरी देश की अमूल्य धरोहर है और यहां से दिया गया संदेश पूरे विश्व में सम्मान के साथ सुना जाता है। उन्होंने कहा कि सूफी-भक्ति आंदोलन ने समानता, मानवता और एकता का संदेश दिया।
रोज़नामा क़ौमी तंजीम के प्रधान संपादक एस. एम. अशरफ फरीद ने कहा कि सूफी-भक्ति आंदोलन ने गंगा-जमुनी तहज़ीब को मजबूत किया और इंसानियत का संदेश दिया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. अफशां बानो, सहायक प्राध्यापक, उर्दू विभाग, पटना विश्वविद्यालय ने किया।
इस अवसर पर खुदाबख्श लाइब्रेरी द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक शोध पत्रिका के नवीन अंक का भी लोकार्पण किया गया। यह पत्रिका शोध एवं साहित्य जगत में प्रतिष्ठित मानी जाती है। निदेशक प्रो. मोहम्मद जाहिदुल हक़ के विशेष प्रयासों से अप्रैल 2024 से लंबित अंकों का प्रकाशन कार्य तेज़ी से पूरा किया गया। आगामी विशेषांक प्रो. कलीमुद्दीन अहमद तथा काज़ी अब्दुल वदूद पर केंद्रित होंगे, जिनके लिए शोधकर्ताओं से आलेख आमंत्रित किए गए हैं।
उद्घाटन सत्र के बाद प्रथम शैक्षणिक सत्र आयोजित किया गया, जिसकी संयुक्त अध्यक्षता प्रो. एजाज़ अली अरशद, पूर्व कुलपति, मौलाना मजहरुल हक़ अरबी एवं फ़ारसी विश्वविद्यालय, पटना तथा प्रो. राजेश शुक्ला, अध्यक्ष, इतिहास विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय ने की।
इस सत्र में चार शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। मासूम अज़ीज़ काज़मी (पूर्व आईजी, बिहार सरकार) ने "गया की खानकाहें, सूफी संत और उनकी साहित्यिक सेवाएं" विषय पर, प्रो. मोहम्मद आरिफ (पूर्व प्राचार्य, डी.आर. महिला कॉलेज, वाराणसी) ने "मध्यकालीन बिहार में सामाजिक समरसता के विकास में सूफियों की भूमिका" विषय पर, डॉ. शिव कुमार मिश्र (पूर्व क्यूरेटर, बिहार स्टेट म्यूज़ियम) ने "मिथिला के कुछ सूफी संत और समाज पर उनका प्रभाव" तथा प्रो. ताबीर कलाम (इतिहास विभाग, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) ने "बिहार के सूफी संत और 13वीं-14वीं शताब्दी में भारतीय भाषाओं का विकास" विषय पर अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए।
अंत में लाइब्रेरी के निदेशक प्रो. मोहम्मद जाहिदुल हक़ ने सभी विद्वानों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि आप सभी की उपस्थिति से यह आयोजन सफल और सार्थक बना है। उन्होंने भविष्य में भी इसी प्रकार सहयोग और मार्गदर्शन की अपेक्षा व्यक्त की। इस अवसर पर उर्दू एक्शन कमेटी बिहार के डॉक्टर अनवारूल होदा, वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर रेहान गनी, वरिष्ठ पत्रकार व शायर मोईन गिरीडीहवी,वरिष्ठ पत्रकार मोहम्मद शाबान, वैशाली जिले के मशहूर पत्रकार मोहम्मद शाहनवाज़ अता आदि समेत अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे। 

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