बलिया के ईसारी सलेमपुर में मनाई गई भोजपुरी के शेक्सपियर,लोक कलाकार भिखारी ठाकुर की पुण्यतिथि।
धनंजय कुमार शर्मा
ईसरी सलेमपुर,बलिया, उतर प्रदेश।
बलिया के डॉ० रामसेवक विकल साहित्य कला संगम सेवा ट्रस्ट के तत्वाधान में (न्यास) इसारी सलेमपुर स्थित कार्यालय पर शुक्रवार को सायं 7 बजे से भोजपुरी के शेक्सपियर, लोक कलाकार भिखारी ठाकुर की पुण्यतिथि मनाई गई।
कार्यक्रम की शुरुवात गुड्डू गुलशन (सिवान बिहार )के द्वारा संगीतमय स्वर से मां सरस्वती की वंदना से हुई। तत्पश्चात उपस्थित विद्वानों ने मां सरस्वती के चित्र पर पुष्प अर्पित, पूजन अर्चन करने के बाद भिखारी ठाकुर और डॉ० रामसेवक 'विकल' जी के चित्र पर पुष्प अर्पित कर सभी लोगों ने श्रद्धांजलि दी।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता ( प्रोo) डॉक्टर शैलेश शौर्य रहे।
कार्यक्रम में अशहर खुर्शीद ने सरस्वती वंदना -"आजा ओ मैया- आजा ओ मैया दर्शन दे जा ओ मैया" से सभी लोग मंत्र मुग्ध हो गए। इस दौरान कार्यक्रम में शेषनाथ विद्यार्थी द्वारा देवी गीत पचरा की प्रस्तुति सभी लोग का मन मोह लिया। इसी क्रम में कुमारी प्रज्ञा शर्मा ने लोक साहित्य और लोकनाट्य में भिखारी ठाकुर, तथा उनपर हुई समीक्षाओं पर विस्तृत वार्ता की। कार्यक्रम में सतीश कुमार गुप्ता ने भी भिखारी ठाकुर से प्रेरणा लेने की बात कही। आगे कार्यक्रम के दौरान हरिओम श्रीवास्तव ने कहा कि आज भी अनेक नाट्य संस्थाएं उनके नाटकों का मंचन करती है। वहीं विनोद राजवंशी ने भिखारी ठाकुर को जनमन का कलाकार बताया। अफजल अहमद ने उनके कालाओं पर चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने रामलीला से लोक कलाकार का सफर बड़ी मेहनत और लगन से पूरा किया। डॉ०सेराज अंसारी ने भी कहा कि भिखारी ठाकुर और डॉ० रामसेवक 'विकल' के साहित्य को संजोकर रखने की जरूरत है। आगे डॉ० आदित्य कुमार 'अंशु' ने भिखारी ठाकुर के जीवन वृत्त पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भिखारी ठाकुर के नाटकों का मंचन कर लोग आज के परिवेश में अपना जीविकोपार्जन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भिखारी ठाकुर सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक थे। देश-विदेश में भी उनके नाटक देखे जाते हैं। उनके नाटकों में बिदेसिया, बेटी बेचवा, विधवा -विलाप, गबर घिचोर, पुत्रवधु, भाई- विरोध, कलयुग प्रेम आदि अनेक प्रमुख नाटक है। डॉo आदित्य कुमार 'अंशु' ने कहा कि भिखारी ठाकुर ने सैकड़ो किताब लिखकर भोजपुरी साहित्य का भंडार भर दिया। डॉ० शैलेश सिंह शौर्य ने भिखारी ठाकुर के नाट्य संरचना पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हजामत बनाने में उनका मन नहीं लगा तो वे कलकत्ता चले गए, वहां भी मन नहीं लगा तो वहां से जगन्नाथ पुरी गए और फिर गांव कुतुबपुर आ गए। वहाँ अपने साथियों के सुझाव पर रामलीला करना आरंभ किया। उनको गाँव पर सगे सम्बन्धी मित्रों का अच्छा सहयोग मिला और उन्होंने नाटक मंडली बनाकर घूम-घूम कर नाटक करने लगे।
अंत में अध्यक्षीय उद्बोधन में शैलेन्द्र श्रीवास्तव (पंकज)जी ने कहा की संजय उपाध्याय ने बिदेसिया नाटक का मंचन आठ सौ से अधिक बार कराया है। इस अवसर पर आशुतोष तिवारी, विजय राम, इमरान अली, सद्दाम अली अनेक लोग उपस्थित थे। कार्य क्रम के अंत में डॉ० आदित्य कुमार 'अंशु' ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया और कहा कि आप लोग इतनी देर तक अपना बहुमूल्य समय दिए, इसके लिए मैं आप सभी का कृतज्ञ हूं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता शैलेश श्रीवास्तव (पंकज )एवं संचालन वरिष्ठ साहित्यकार डॉo आदित्य कुमार 'अंशु ' ने किया।
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