पेपर लीक बिल का उद्देश्य केवल सज़ा नहीं, रोकथाम होना चाहिए: Gen Z की लोकतांत्रिक आवाज़ के साथ विश्वासघात नहीं, सुधार की जरूरत” — रेयाज़ आलम

सनोबर खान 
 पटना, बिहार।
पेपर लीक और परीक्षाओं में होने वाली अनियमितताओं के खिलाफ पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) अमेंडमेंट बिल, 2026 पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता एवं कॉरपोरेट प्रोफेशनल रेयाज़ आलम ने कहा कि परीक्षा में धांधली करने वालों के लिए कड़ी सज़ा आवश्यक है, लेकिन किसी भी एंटी-पेपर लीक कानून की वास्तविक सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि वह अपराध होने के बाद कितनी कठोर सज़ा देता है, इससे नहीं बल्कि इस बात से कि वह अपराध को होने से पहले रोकने में कितना प्रभावी है। 
उन्होंने कहा, “रोकथाम सज़ा से अधिक महत्वपूर्ण है।” जो छात्र वर्षों तक मेहनत करके किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है, उसे पेपर लीक होने के बाद कठोर सज़ा के ऐलान की जरूरत नहीं होती; उसे ऐसे परीक्षा तंत्र की आवश्यकता होती है जहाँ पेपर लीक करना लगभग असंभव हो।
रेयाज़ आलम के अनुसार एक व्यापक सुधार प्रणाली में प्रश्नपत्र तैयार करने और उसके परिवहन की सुरक्षित व्यवस्था, डिजिटल सुरक्षा, नियंत्रित पहुँच, परीक्षा संस्थाओं का स्वतंत्र ऑडिट, जवाबदेही, रियल-टाइम मॉनिटरिंग, व्हिसलब्लोअर संरक्षण, त्वरित जांच और पारदर्शी शिकायत निवारण व्यवस्था शामिल होनी चाहिए।
उन्होंने कहा, “सज़ा अंतिम सुरक्षा दीवार है, जबकि रोकथाम पहली सुरक्षा दीवार होनी चाहिए। यदि व्यवस्था केवल अपराधी को दंडित करने में कठोर और छात्र को सुरक्षित रखने में कमजोर रहती है, तो यह सुधार नहीं बल्कि केवल प्रतिक्रिया देने वाली व्यवस्था बन जाएगी।”
Gen Z ने लोकतांत्रिक शक्ति का प्रदर्शन किया है
रेयाज़ आलम ने कहा कि परीक्षा संबंधी अनियमितताओं के खिलाफ Gen Z के आंदोलन ने एक बड़े लोकतांत्रिक संदेश को जन्म दिया है।
छात्रों के बीच पैदा हुआ गुस्सा और असंतोष धीरे-धीरे एक संगठित लोकतांत्रिक आवाज़ में बदल गया, जिसने जवाबदेही की मांग उठाई। युवाओं के लगातार संघर्ष ने यह साबित किया कि युवा नागरिकों को राजनीतिक रूप से अपरिपक्व, अधीर या गैर-जिम्मेदार समझकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा:“Gen Z आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश केवल यह नहीं है कि एक मंत्री ने इस्तीफा दिया। असली संदेश यह है कि जब युवा नागरिक शांतिपूर्ण तरीके से संगठित होते हैं, अपनी मांगों को स्पष्ट रूप से रखते हैं और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज़ उठाते हैं, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं को उनकी बात सुननी पड़ती है।”
उन्होंने कहा कि किसी भी आंदोलन का अंतिम उद्देश्य संवाद, बातचीत और संस्थागत सुधार होना चाहिए।
“युवा आंदोलन का जवाब टकराव नहीं बल्कि संवाद होना चाहिए। प्रदर्शनकारी छात्रों के प्रतिनिधियों से बातचीत होनी चाहिए, उनकी जायज़ मांगों को दर्ज किया जाना चाहिए और उनसे किए गए वादों को पूरा किया जाना चाहिए।”

समझौता राजनीतिक मोलभाव का माध्यम नहीं बन सकता

रेयाज़ आलम ने कहा कि प्रदर्शनकारी छात्रों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत और उसके बाद सामने आई सहमतियों एवं आश्वासनों के पश्चात उत्पन्न परिस्थितियों ने राज्य और नागरिकों के बीच विश्वास के एक गंभीर प्रश्न को जन्म दिया है।
उन्होंने कहा कि यदि युवा प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों को बातचीत के लिए बुलाया जाए, उनके साथ कोई समझ या आश्वासन तय हो और उसी आधार पर आंदोलन वापस लेने या समाप्त करने की अपेक्षा की जाए, तो उन आश्वासनों की लोकतांत्रिक अहमियत होती है।
“ऐसे आश्वासनों को बाद में कमजोर, बदल या चुनिंदा तरीके से लागू नहीं किया जा सकता। यदि सरकार और युवाओं के बीच कोई समझ बनी है, तो उसका सम्मान और पालन आवश्यक है।”
उन्होंने चेतावनी दी कि किसी भी समझ से पीछे हटना युवा पीढ़ी और लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच एक गंभीर विश्वास संकट पैदा कर सकता है।
“सरकार संसद में बहुमत के बल पर किसी बहस में जीत सकती है, लेकिन उसे अपने युवा नागरिकों का विश्वास खोने की कीमत नहीं चुकानी चाहिए।”सज़ा से रोकथाम तक; आंदोलन से सुधार तक
रेयाज़ आलम ने कहा कि अब देश के पास अवसर है कि वह तत्काल राजनीतिक विवाद से आगे बढ़कर परीक्षा व्यवस्था में बुनियादी सुधार करे।
“उद्देश्य केवल यह नहीं होना चाहिए कि पेपर लीक करने वालों में सज़ा का भय पैदा हो; उद्देश्य ऐसी परीक्षा व्यवस्था तैयार करना होना चाहिए जहाँ पेपर लीक करने का अवसर, प्रोत्साहन और संस्थागत कमजोरी ही मौजूद न रहे।”
उन्होंने परीक्षा प्रक्रिया के हर स्तर पर जवाबदेही तय करने की मांग करते हुए कहा कि जिम्मेदारी केवल निचले स्तर के व्यक्तियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
“यदि परीक्षा व्यवस्था बार-बार विफल होती है, तो हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि ‘किसे सज़ा दी जाए?’ बल्कि यह भी पूछना चाहिए कि ‘इसे रोकने की जिम्मेदारी किसकी थी?’ जवाबदेही ऊपर से नीचे तक तय होनी चाहिए।”
एक पीढ़ी का संदेश
रेयाज़ आलम ने युवा आंदोलन की भावना को इन पंक्तियों के माध्यम से व्यक्त किया:
“जवानी की जलती मशालें उठाकर,
अंधेरों की आंधी को हम चीर देंगे।
लहू में जो एक आग 🔥 भड़की है उससे,
वतन को नई एक तस्वीर देंगे।”
उन्होंने कहा कि ये पंक्तियां उस पीढ़ी की आकांक्षा और संकल्प को व्यक्त करती हैं जो अन्याय, संस्थागत विफलता और वादाखिलाफी को चुपचाप स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
“Gen Z केवल पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन नहीं कर रही; वह ऐसे सिस्टम की मांग कर रही है जो मेरिट का सम्मान करे, मेहनत की कद्र करे और हर युवा भारतीय के भविष्य की रक्षा करे। यह मांग दलगत राजनीति से कहीं बड़ी है।”
रेयाज़ आलम ने कहा:“आइए इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक मंत्री के इस्तीफे, एक बिल के पारित होने या किसी एक राजनीतिक समूह की जीत तक सीमित न करें। वास्तविक सफलता तब होगी जब एक सामान्य छात्र परीक्षा कक्ष में इस पूर्ण विश्वास के साथ प्रवेश कर सके कि उसकी वर्षों की मेहनत किसी पेपर लीक, भ्रष्ट नेटवर्क या अक्षम व्यवस्था के कारण बर्बाद नहीं होगी।”
उन्होंने अंत में कहा:“युवाओं ने मशाल जला दी है। अब राज्य की जिम्मेदारी है कि इस रोशनी को सुधार की दिशा में ले जाए—न कि विरोध, वादों और निराशा के एक और चक्र की ओर।”

Comments

Popular posts from this blog

The Robotics and AI Innovation Lab was inaugurated at Carmel Girls' Inter College.

नशा मुक्त भारत अभियान के तहत एक परिचर्चा का आयोजन किया गया।

जो सिफत बाप में होती है कमोबेश वही सिफत औलाद में पाई जाती है - मुफ्ती अकरम