शराबबंदी पुलिस प्रशासन के लिए कामधेनु गाय बनी:-- सुरैया शहाब

शहाबुद्दीन अहमद 
बेतिया, बिहार।
बिहार सरकार ने जिस उद्देश्य के तहत शराबबंदी कानून लागू की थी,वह उद्देश्य पूर्ण रूप सेअपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सकी,इसमें कई खामियां उजागर हो रही हैं,जिसके कारण पूर्ण शराबबंदी लागू नहीं हो पा रही है।सरकार के जिन विभागों के द्वारा पूर्ण शराबबंदी लागू करने की जिम्मेदारी दी गई थी, वहअपनी जिम्मेदारी सही ढंग से नहीं निभा पा रहे हैं,
इसमें कई दावपेंच चले जा रहे हैं,कहीं इसको कामधेनु गाय बनाकर रख दिया गया है,तो कहीं इस शराबबंदी कानून का नाजायज फायदा उठाकर करोड़ करोड़ रूपया का नाजायज राशि की उगाही की जा रही है।इस नाजायज राशि की उगाही में,मध्निषेध एवं निबंधन विभाग के साथ-साथ पुलिस प्रशासन भी कम साझेदार नहीं है। जिले में जितने भी थानाअध्यक्ष हैं सभी के लिए शराबबंदी कानून लागू करने में कई व्यवधान सामने आ रहे हैं जिनका सामना करने के लिए पुलिस प्रशासन दिखावटी रूप में मुस्तादी तो दिखता है मगर अंदरूनी तौर पर इसमें इसकी संलिप्तता भी उजागर हो रही है।कई थानाअध्यक्षों को सूचना देने पर भी सही समय पर जाकर छापेमारी नहीं करते हैं,क्योंकि उनको उनका सुविधा शुल्क प्रतिमाह आसानी से मिल जाता है।
इस संबंध में कई बार संवाददाता को सूचना ग्रामीणों के द्वारा मिलती है कि पुलिस को सूचना देने के बाद भी शराब बेचने, पीने,बनाने वाले केअड्डे पर छापेमारी नहीं करती है, उल्टे सूचना देने वाले को पुलिस पड़कर तंग करती है,उससे मारपीट,गाली गलौज करती है,इन्हीं सब
कर्म से सूचना देने वाले व्यक्ति डरते हैं। जिले के अंदर जितने भी थाना अध्यक्ष हैं अगर वह इमानदारीपूर्वक शराबबंदी कानून को लागू करेंगे तो यह शराबबंदी कानून शत प्रतिशत सफल हो जाएगा,
मगर यह लोग नहीं कर सकते हैं क्योंकि यह शराबबंदी उनके लिए लक्ष्मीनिया गाय हैं।
शराबबंदी कानून केअगर दूसरे पहलू पर गौर किया जाए तो अवैध और नकली शराब को से सेवन के सेवन से समय-समय पर लोगों की जान जाने की गंभीर मामले सामने आए हुए हैं। 
शराब की बिक्री पर मिलने वाले कर के बंद होने से सरकार को हर साल हजारों करोड़ों रुपए के राजस्व का नुकसान हो रहा है जिसका असर विकास कार्यों पर पड़ रही है। पुलिस और प्रशासनिक तंत्र का एक बड़ा हिस्सा शराबबंदी को लागू करने में व्यस्त रहता है,जिससे अन्य मामलों पर असर पड़ता है,मगर सफलता हाथ नहीं लगती है।
शराबबंदी कानून के अंतर्गत पड़ोसी राज्यों झारखंड उत्तर प्रदेश नेपाल से आने वाले ट्रैकों और वाहनों से सीमा पटना पुलिस और आबकारी विभाग की मिली भगत से भी राशि की वसूली की जा रही है। शराब के तस्वीरों से बाकायदा मंथली या प्रतीक गाड़ी के हिसाब से रकम तय होती है पैसा मिलने पर पुलिस कुछ उन गाड़ियों को सुरक्षित रास्ता बताती है,जिससे शराब कारोबारी आसानी सेअपने गणतव्य स्थान पर पहुंच जाते हैं।
छोटे-छोटे शराब धंधेबाजों को स्थानीय पुलिस थाना स्तर पर पुलिस संरक्षण में होमडिलीवरी की जानबूझकर नजरअंदाज किया जाता है। प्रत्येक थाना क्षेत्र में अवैध शराब बेचने वालों की लिस्ट होती है जिसे साप्ताहिक या मासिक बँधीबधाई रकम ले ली जाती है। गिरफ्तारी और प्राथमिक की दर्ज करने का डर दिखाकर, राशि की वसूली की जाती है,इतना ही नहीं,शराबबंदी के सख्त कानून कोबताकर
जिसमें जमानत मिलना मुश्किल होता है,उसका भय दिखाकरभी राशि की वसूली की जाती है, इसके अलावा पकड़े गए लोगों से धाराएं कमजोर करने के नाम पर मोटी रकम वसूल की जाती है। इतना ही नहीं कई बार शराब पीने या रखने के झूठे आरोप में फसाने की धमकी देकर आम लोगों से भी अवैध वसूली की जाती है। पुलिस रिकॉर्ड में जो शराब जप्त दिखाई जाती है उसमें से एक बड़ा हिस्सा मार खाने से गायब कर दिया जाता है अक्सर बयानों में कहा जाता है कि शराब चूहे पी गए हैं,बोतल टूट गई,फुट गई,जबकि उसके ऊंचे दामों पर बाजारों में बेच दिया जाता है। पुलिस प्रशासन के द्वारा महंगी और विदेशी शराब को जप्त करने के बाद अधिकारी अपने व्यक्तिगत उपयोग में लेते हैं या उसे ब्रेक मार्केट में भेज देते हैं। 
पुलिस सीधे पैसा लेने के बजाय स्थानीय दलालों या अपने खास मुखबिरों के जरिए डील करती है ताकि कोई सबूत या ऑडियो वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं हो सके। एक अच्छा के शराब पकड़ने वाले लोग को दूसरे गुट से पैसा लेने के साथ-साथ पुलिस के साख को बचाना रहता है।
सरकार का शराबबंदी का उद्देश्य सामाजिक सुधार था लेकिन जमीन पर किसने पुलिस प्रशासन के एक बड़े हिस्से के लिए समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी कर दी है यही कारण है कि सरकार के सख्त हिदयातुन और निलंबन के बावजूद यह अवैध कमाई का जरिया बन गया है।
सरकार चाहे जितना भी कोशिश कर ले कर पूर्ण शराबबंदी को लागू करने के लिए मगर यह कभी भी सफल नहीं हुआ है और न
ही होगा,जब तक पुलिस प्रशासनअपनी ईमानदारी नहीं दिखाएगी,जिस दिन पुलिस प्रशासनअपनी बेईमानी को छोड़ देगा,इसे कामधेनु गाय समझना छोड़ देगा उस दिन शराबबंदी कानून पूर्णरूप से लागू हो जाएगी,और धरातल पर सही नक्शा नजर आएगा। स्थानीय मानवाधिकार- सह- सामाजिक कार्यकर्ता, सुरैया शहाब ने जनहित में,
जिला स्तर से लेकर प्रखंड स्तर तक के पुलिस पदाधिकारीयों सेअपनी कार्यशैली में सुधार करते हुए,सुविधाशुल्क की लालच छोड़कर,देशहित और राज्यहित में सरकार के द्वारा घोषित शराबबंदी कानून काअक्षरसह पालन करते हुएअपनी पूरी जिम्मेदारियां को समझते हुए इस कानून को कड़ाई से पालन कराएं,तभी जाकर पूर्ण शराबबंदी कानून लागू हो सकेगा।

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