प्रशांत किशोर का उभार बिहार में पहचान आधारित राजनीति से मुद्दा आधारित राजनीति की ओर संभावित बदलाव का संकेत है- मोहम्मद रेयाज़ आलम
पटना, बिहार।
वरिष्ठ कॉर्पोरेट प्रोफेशनल एवं सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद रेयाज़ आलम ने कहा है कि प्रशांत किशोर की बढ़ती राजनीतिक स्वीकार्यता इस बात का संकेत देती है कि बिहार की राजनीति में अब धीरे-धीरे सुशासन, विकास, शिक्षा, रोजगार और जवाबदेही जैसे मुद्दे जाति, धर्म और परिवारवाद आधारित पारंपरिक राजनीति पर प्राथमिकता प्राप्त कर रहे हैं।
सोमवार को मीडिया को जारी अपने बयान में रेयाज़ आलम ने कहा कि बिहार ने दशकों तक ऐसी चुनावी राजनीति देखी है, जो मुख्यतः जातीय समीकरणों, धार्मिक ध्रुवीकरण और वंशवादी राजनीतिक संरचनाओं से प्रभावित रही है। यद्यपि इन कारकों ने चुनावी परिणामों को प्रभावित किया, लेकिन इससे आम नागरिकों के जीवन से जुड़े मूलभूत मुद्दे अक्सर पीछे छूट गए।
उन्होंने कहा, “बिहार का राजनीतिक विमर्श अब धीरे-धीरे परिवर्तन की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। विशेषकर युवा मतदाता अब ऐसी नेतृत्व क्षमता की अपेक्षा कर रहे हैं जो पारदर्शी शासन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार के अवसर, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ और सतत आर्थिक विकास सुनिश्चित करे, न कि केवल जाति या धर्म के आधार पर समर्थन प्राप्त करे।”
उन्होंने कहा कि राजनीतिक विचारधारा या दलगत संबद्धता से ऊपर उठकर यदि कोई नेता सार्वजनिक बहस को सुशासन, सार्वजनिक नीति और विकास जैसे विषयों की ओर मोड़ने में सफल होता है, तो इसे लोकतांत्रिक राजनीति के लिए सकारात्मक संकेत माना जाना चाहिए।
“प्रशांत किशोर के राजनीतिक उभार का महत्व केवल चुनावी प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात में है कि उन्होंने स्थापित राजनीतिक दलों को शासन, सार्वजनिक नीति और विकास जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा करने के लिए प्रेरित किया है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब चुनाव पहचान नहीं, बल्कि विचारों और नीतियों के आधार पर लड़े जाएँ।”
रेयाज़ आलम ने कहा कि बिहार की विशाल युवा आबादी अब राजनीतिक नेतृत्व का मूल्यांकन उसके प्रदर्शन और जवाबदेही के आधार पर कर रही है।
“आज की पीढ़ी की आकांक्षाएँ जातीय और धार्मिक पहचान से कहीं आगे बढ़ चुकी हैं। युवा अवसर, सम्मान, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार, उद्यमिता और प्रभावी सुशासन चाहते हैं। जो राजनीतिक दल इस बदलती सोच को समझने में असफल रहेंगे, वे धीरे-धीरे मतदाताओं से कटते चले जाएँगे।”
बिहार की राजनीति की भावी दिशा पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य इस समय लोकतांत्रिक परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है।
“आने वाले वर्षों में केवल परिवारवाद, व्यक्तिपूजा और पहचान आधारित राजनीतिक लामबंदी पर आधारित राजनीति का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो सकता है। भविष्य उन्हीं नेताओं का होगा जो स्पष्ट दृष्टि, प्रशासनिक क्षमता और जनता के प्रति जवाबदेही का प्रमाण प्रस्तुत करेंगे।”
हालाँकि उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि सार्थक राजनीतिक परिवर्तन किसी एक व्यक्ति के भरोसे संभव नहीं है।
“कोई भी एक नेता अकेले बिहार का कायाकल्प नहीं कर सकता। स्थायी प्रगति के लिए मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएँ, जागरूक नागरिक, जिम्मेदार राजनीतिक दल, पारदर्शी शासन और सक्रिय जनभागीदारी आवश्यक है। नेतृत्व परिवर्तन की शुरुआत कर सकता है, लेकिन उसे स्थायी बनाना पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।”
उन्होंने सभी राजनीतिक दलों और लोकतांत्रिक हितधारकों से आग्रह किया कि वे विभाजनकारी विमर्श के बजाय नीति आधारित बहस को प्राथमिकता दें।
उन्होंने कहा, “बिहार की जनता ऐसी राजनीति की हकदार है जो शिक्षा, रोजगार, औद्योगीकरण, स्वास्थ्य, कृषि सुधार, महिला सशक्तिकरण, सामाजिक न्याय और सुशासन पर केंद्रित हो। लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब नागरिक वंशानुगत राजनीतिक पहचान के बजाय प्रदर्शन, ईमानदारी और दूरदृष्टि के आधार पर अपना मताधिकार प्रयोग करें।”
अपने वक्तव्य के समापन में मोहम्मद रेयाज़ आलम ने कहा कि बिहार ने ऐतिहासिक रूप से देश को बौद्धिक और राजनीतिक नेतृत्व प्रदान किया है और उन्हें विश्वास है कि राज्य एक बार फिर यह सिद्ध करेगा कि विचारों, संवैधानिक मूल्यों और जनकल्याण पर आधारित लोकतांत्रिक राजनीति पहचान आधारित चुनावी लामबंदी पर विजय प्राप्त कर सकती है।
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