अब्दुल ग़फू़र की जिन्दगी बहुत सादा थी, फाउंडेशन की 15 सुत्री मांग की मुख्यमंत्री से करुंगा सिफारिश - श्रवण कुमार
पटना / हाजीपुर, बिहार।
अब्दुल गफूर मेमोरियल फाउंडेशन की ओर से बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय अब्दुल गफूर की याद में ‘‘अब्दुल गफूर और उनकी बेलौस जिंदगी’’ विषय पर एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान, मैंगल्स रोड, पटना, बिहार विधानसभा गेट नंबर 13 के सामने किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि बिहार सरकार में ग्रामीण विकास विभाग, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के मंत्री श्री श्रवण कुमार ने भी सेमिनार को संबोधित किया और पूर्व मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी बेलौस जिंदगी और सार्वजनिक जीवन को अनुकरणीय बताया। उन्होंने कहा कि अब्दुल गफूर का जीवन समाज और सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी तथा सादगी के महत्व को रेखांकित करता है। गफूर साहब की सादगी का चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जब वह समता पार्टी के अध्यक्ष थे तो हम लोग उनके बहुत करीब थे और जब मिलने जाते तो वह गंजी लुंगी में रहते तो उसी हालत में मिलते थे। उन्होंने अब्दुल ग़फू़र मेमोरियल फाउंडेशन की पंद्रह सुत्री मांग का समर्थन किया और कहा कि इसमें बहुत कुछ जरूरी मांगें हैं, मैं सरकार से सिफारिश करुंगा। अध्यक्षीय भाषण में डाॕ0 अहमद अशफाक करीम ने कहा कि स्वर्गीय अब्दुल गफूर का जन्म एक किसान परिवार में हुआ था। वे बचपन से ही मेधावी थे। छात्र जीवन में ही देश की सेवा के लिए सक्रिय हो गए और स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए। उस समय वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र थे।
उन्होंने कहा कि लंबे राजनीतिक और सामाजिक जीवन में अपनी सेवाओं तथा संघर्ष के आधार पर अब्दुल गफूर बिहार के मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे। उनके मुख्यमंत्री बनने से न केवल मुस्लिम समाज का भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विश्वास मजबूत हुआ, बल्कि गरीबों, वंचितों, न्यायप्रिय और ईमानदार लोगों में भी उत्साह का वातावरण बना। उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘चचा गफूर’’ ने ईमानदारी और नैतिकता का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी मिसाल रहेगा। उन्होंने अपना पूरा जीवन स्वाभिमान और ईमानदारी के साथ बिताया। मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद उनके रिक्शे से घर लौटने की घटना उनके सादगीपूर्ण और स्वाभिमानी जीवन का प्रतीक मानी जाती है। उन्होंने कहा कि गफूर साहब 1984 में राजीव गांधी के साथ सपथ लेने वाले नेता थे, वह अपनी प्रशंसा सुनना पसंद नहीं करते थे बस काम ही उनकी पहचान थी। नीतीश कुमार की सरकार की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार की सरकार ने जितना काम किया है उसका कर्ज अभी हम पर बाकी है। अब्दुल ग़फू़र मेमोरियल फाउंडेशन की मांगों का उन्होंने समर्थन किया।
फाउंडेशन के अध्यक्ष मो0 मिन्हाज ढाकवी ने इस अवसर पर कहा कि अब्दुल गफूर का जीवन नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनके राजनीतिक जीवन, सामाजिक सरोकार, ईमानदारी, स्वाभिमान और समाज के कमजोर वर्गों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को व्यापक स्तर पर सामने लाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि फाउंडेशन भविष्य में भी अब्दुल गफूर की विचारधारा और उनके सार्वजनिक जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर कार्यक्रम आयोजित करता रहेगा। वहीं अब्दुल ग़फू़र मेमोरियल फाउंडेशन के सचिव एवं कौमी असातिजह तंजीम बिहार के प्रदेश अध्यक्ष मो0 रफी ने कहा कि सबके अलग व्यक्तित्व होते हैं, अब्दुल ग़फू़र साहब का व्यक्तित्व सबसे भिन्न एवं अनुकरणीय है। उन्होंने परिस्थितियों से कभी भी समझौता नहीं किया और भ्रष्टाचार के विरुद्ध मजबूती से खड़े रहे। जाती, धर्म ने उनको संवैधानिक पद पर रहते हुए कभी प्रभावित नहीं किया, लेकिन अफसोस कि उनके साथ मुसलमानों जैसा व्यवहार किया गया, पूरे राज्य में सद्भावना बिगाड़ने का प्रयास हुआ लेकिन बिहार का आम जन किसी झांसे में नहीं पड़ा और पूरा दो वर्ष बहुत सफलता के साथ बिहार सरकार का संचालन किया। कौमी असातिजह तंजीम बिहार के प्रदेश प्रधान महासचिव मो0 ताजुद्दीन ने आलेख पढ़ते हुए विस्तार से अब्दुल गफूर साहब की जीवनी पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. अहमद अशफाक करीम ने की। कार्यक्रम का उद्घाटन दीप प्रज्वलित कर किया गया। कार्यक्रम का संचालन अब्दुल गफूर मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष मो0 मिन्हाज ढाकवी ने किया, जबकि फाउंडेशन के सचिव मो0 रफी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ सेमिनार का समापन हुआ। इस आवसर पूर्व कुलपति आर्य भट्ट नालेज विश्वविद्यालय एवं पूर्व निदेशक उच्च शिक्षा विभाग बिहार प्रोफेसर सैयद मो0 करीम साहब को अब्दुल ग़फू़र अवार्ड 2026 से नवाजा गया। साथ ही माननीय मंत्री जी को अब्दुल गफूर मेमोरियल फाउंडेशन की ओर से 15 सुत्री मांगों का एक मांग पत्र भी सौंपा। कार्यक्रम में मुख्य वक्ताओं के रूप में अबदुस सलाम अंसारी, अरशद फिरोज, मो0 रफी, ए.के. अलवी, मो0 ताजुद्दीन, डॉ. अनवारूल होदा, मौलाना शिब्ली कासमी, इम्तियाज अहमद करीमी, अब्दुस सलाम अंसारी, अरशद फिरोज, जाकिर हसन सिद्दीकी, रफी अहमद, अब्दुल्लाह उर्फ शहंशाह, नबीउल्लाह अहसन, मिन्हाज रब्बानी, जमशेद हुसैन, मो0 अलीमुद्दीन, हाफिज रिजवानुल्ला, अजीमुद्दीन अंसारी, मोहम्मद शाहनवाज अता, अब्दुल कादिर सहित अन्य वक्ताओं ने अब्दुल गफूर के राजनीतिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला।
इस अवसर पर अब्दुल गफूर मेमोरियल फाउंडेशन के पदाधिकारी एवं सदस्य विशेष रूप से उपस्थित रहे। इनमें डॉ. अहमद अशफाक करीम—सरपरस्त-ए-आला, मो0 मिन्हाज ढाकवी—अध्यक्ष, मो0 रफी—सचिव, काजी नकीब एकता—कोषाध्यक्ष, मो0 जावेद आलम—सदस्य, मोहम्मद कैशर—सदस्य तथा मो0 इकराम—सदस्य शामिल थे। इसके साथ ही विभिन्न जिलों के जिलाध्यक्षों में नसीम अख्तर—मुजफ्फरपुर, प्रोफेसर एजाज आलम—वैशाली, शाकिर रजा—समस्तीपुर, मोहम्मद अरमान अली—सीतामढ़ी, बाबू आलम—बेतिया, मोहम्मद अली जफर—गोपालगंज, तथा तनवीर आरिफीन—अरवल प्रमुख रूप से शामिल रहे। इसके साथ ही सेमिनार में बड़ी संख्या में शिक्षाविद, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, पत्रकार एवं विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोग उपस्थित रहे।
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