महिलाओं को 33%आरक्षण मिलना संवैधानिकअधिकार, तत्कालआरक्षण लागू करने की मांग:-- सुरैया शहाब
शहाबुद्दीन अहमद
बेतिया, बिहार।
भारत वर्ष में महिलाओं का 33%आरक्षण मिलना उनका संवैधानिकअधिकार है। संसद,राज्यसभा और विधानसभाओं में 33% महिलाआरक्षण को बिना शर्त तत्काल लागू करने की मांग,स्थानीय मानवाधिकार- -सह सामाजिक कार्यकर्ता, सुरैयाशहाब ने जनहित में की है।उन्होंने प्रेसवार्ता के माध्यम से कहा कि भारत के नागरीकों कि यह मांग है कि महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को बिना किसी शर्त तत्काल लागू किए जाएं,केंद्र सरकार से मांग करती हूं कि वह संसद केआगामी मानसून सत्र में संविधान(106वें संशोधन)अधिनियम,2023 मेंआवश्यक संशोधन हेतु संविधान संशोधन हेतु विधेयक प्रस्तुत करें,ताकि महिलाआरक्षण को उनके जनगणना और परिसीमन की शर्त सेअलग रखा जाए।
सुरैया शहाब नेआगे कहा कि यहअत्यंत शर्मनाक बात है कि राष्ट्रीय सनसदों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भारत185 देश में 151स्थान पर है।दशकों से
भारत की महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व और निर्णय प्रक्रिया में उनके न्याय संगतअधिकार से वंचित रखा गया है।महिलाओं के साथ यह ऐतिहासिक अन्याय अब नहीं सहा जाएगा।सन 2023 में जब संविधान का 106 , वीं संशोधनअधिनियम सन 2023 के माध्यम से महिला आरक्षण कानून पारित किया गया,तब उसकी क्रिया नियमित जनगणना और परिसीमन के प्रक्रिया पूरी होने तक टाल दिया गया,उस समय भी महिला संगठन संसद के अनेक सदस्यों ने इस शर्त व्यवस्था पर गंभीरआपत्ति दर्ज थी,यदि यह शर्त ना रखी गई होती तो वर्तमान लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी 33% होती,जब केआज यह 14% से भी कम है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार महिला आरक्षण के मुद्दे का इस्तेमाल अपने राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए कर रही है,इसी कारणवश्य महिला आरक्षण को तत्काल लागू करने के बजाय उसे परिसीमन से जोड़कर लगातार टाल रही है। सरकार की यह मंशा वर्ष 2026 में एक बार फिर सामनेआई, जब उसने संसद का विशेष सत्र बुलाकर यह दिखाने की कोशिश की कि वह 2019 से लोकसभा,राज्यसभा, विधानसभा में 33% महिला आरक्षण लागू करना चाहती है,लेकिन महिलाआरक्षण को परिसीमन जैसे राजनीतिक रूप से विवादास्पद मुद्दे से अलग करने का कोई पहल नहीं की,इससे यह स्पष्ट होता है कि नारीशक्ति का उसका दावा केवल एक नारा है। महिलाओं को उनका अधिकार देने की वास्तविक राजनीतिक मंशा उसके कार्यों में दिखाई नहीं देता है। सन 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून संसद और राज्य के विधानसभा में महिलाओं की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए दशकों तक चला जिस व्यापक संघर्ष,आंदोलन का परिणाम है,लेकिन जनगणना परिसीमन की शर्त ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि को भी अधूरा बना दिया,यह लगातार क्रियान्वयन उसे गहरी सत्तात्मक मानसिकता को उजागर करता है,जो महिलाओं के राजनीतिक भागीदारी और समान अधिकारों को लगातार पीछे धकेल रही है। हम भारत सरकार से मांग करते हैं कि आगामी मानसून सत्र में महिलाआरक्षण को जनगणना और परिसीमन की शर्त से अलग करने के लिए संविधान संशोधन विधेयक तत्काल प्रस्तुत करें।
संसद और सभी राज्य विधानसभाओं की वर्तमान सीटों की संख्या के आधार पर आगामी चुनाव से ही महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करें।
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