जब मंज़िल आख़िरत हो, तो दुनिया की थकान भी एक याद दिलाने वाली निशानी बन जाती है।
“हर रात मेरी आँखें इन सोचों में गुम हो जाती हैं,*
नई दिल्ली:
ज़िंदगी के सफ़र में कभी-कभी इंसान ठहरकर पीछे देखता है और अपने आप से कुछ बेहद गहरे सवाल करता है—मेरी ज़िंदगी का वास्तविक उद्देश्य क्या था? मैंने अपने कीमती दिनों को किन चीज़ों को हासिल करने में लगा दिया? और आख़िर किस चीज़ ने मेरे दिल और रूह को इतना थका दिया?
शायद इन सवालों का जवाब तब और स्पष्ट होता है, जब हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि हम इस दुनिया में क्या तलाश कर रहे हैं और हमारी अंतिम मंज़िल कहाँ है।
दुनिया हमारा समय, हमारी ऊर्जा, हमारी महत्वाकांक्षाएँ और हमारा ध्यान मांगती है। हम वर्षों तक सफलता, दौलत, प्रतिष्ठा, पद और संपत्ति की तलाश में दौड़ते रहते हैं। लेकिन एक समय ऐसा आता है जब एहसास होता है कि हमने जो कुछ यहाँ जमा किया, वह सब अस्थायी है। इनमें से कोई भी चीज़ हमारे साथ क़ब्र के पार नहीं जाएगी।
क़ुरआन हमें याद दिलाता है:
“हर जान को मौत का स्वाद चखना है और तुम्हें क़यामत के दिन ही तुम्हारे कर्मों का पूरा बदला दिया जाएगा। अतः जो व्यक्ति आग से बचा लिया गया और जन्नत में दाख़िल कर दिया गया, वही वास्तव में सफल हुआ।”
— क़ुरआन 3:185
यह आयत दुनिया की सफलता को उसके सही परिप्रेक्ष्य में देखने की सीख देती है। वास्तविक सफलता केवल यह नहीं कि हमने इस दुनिया में कितना हासिल किया, बल्कि यह भी है कि हमने आख़िरत के लिए क्या तैयार किया।
अल्लाह तआला एक और स्थान पर फ़रमाता है:
“जान लो कि सांसारिक जीवन केवल खेल, मनोरंजन, सजावट, आपस में गर्व करना और धन तथा संतान में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ है…”
— क़ुरआन 57:20
रसूलुल्लाह PBUH ने भी दुनिया के प्रति हमारा दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए फ़रमाया:
“दुनिया में ऐसे रहो जैसे तुम अजनबी हो या किसी रास्ते से गुज़रने वाले मुसाफ़िर हो।”
— सहीह अल-बुख़ारी 6416
मुसाफ़िर कभी रास्ते में मिलने वाली किसी अस्थायी जगह को अपनी अंतिम मंज़िल नहीं समझता।
दुनिया हमारा सफ़र है; हमारी अंतिम मंज़िल नहीं।
इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपनी ज़िम्मेदारियों, परिवार, पेशे या अपनी आकांक्षाओं को छोड़ दें। बल्कि इसका अर्थ है कि हम उन्हें उनकी सही जगह दें। हमें ईमानदारी से मेहनत करनी है, अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभानी हैं, परिवार का ख़याल रखना है, समाज और इंसानियत की सेवा करनी है और बेहतर जीवन के लिए प्रयास करना है—लेकिन दुनिया की अस्थायी चमक-दमक को अपने दिल और जीवन का स्थायी उद्देश्य नहीं बनने देना है।
शायद जिस थकान को हम कभी-कभी महसूस करते हैं, वह केवल शारीरिक थकान नहीं होती।
शायद हमारी रूह के भीतर कहीं एक सवाल उठ रहा होता है:
“क्या मैं अपनी ज़िंदगी उस जगह की तैयारी में लगा रहा हूँ, जहाँ मुझे वास्तव में हमेशा रहना है?”
यह सवाल हमारे जीवन को देखने का पूरा नज़रिया बदल सकता है।
हमारी परेशानियाँ सब्र बन सकती हैं।
हमारी नेमतें शुक्र बन सकती हैं।
हमारी ईमानदार मेहनत इबादत बन सकती है।
इंसानियत की सेवा अल्लाह की रज़ा हासिल करने का ज़रिया बन सकती है।
और दुनिया का यह सफ़र आख़िरत की तैयारी बन सकता है।
एक दिन इस दुनिया का सारा शोर ख़ामोश हो जाएगा।
हमारे पद यहीं रह जाएंगे।
हमारी संपत्ति यहीं रह जाएगी।
तालियाँ और प्रशंसा यहीं रह जाएँगी।
और हम अपने रब के सामने केवल उन्हीं कर्मों के साथ खड़े होंगे, जिन्हें हमने अपने आगे भेजा होगा।
इसलिए शायद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि हमने दुनिया में कितना हासिल किया, बल्कि यह है कि हमने अपनी ज़िंदगी का कितना हिस्सा उस तरीके से जिया, जो हमें आख़िरत के लिए तैयार करता है।
अपनी ज़िंदगी के सफ़र पर विचार करते हुए मेरी दुआ है कि मेरी ज़िंदगी का जो भी हिस्सा बाकी है, वह अधिक उद्देश्यपूर्ण हो—ईमान, विनम्रता, सेवा, कृतज्ञता और अल्लाह की रज़ा की सच्ची तलाश के साथ।
अल्लाह हमारे जीवन के शेष हिस्से को बीते हुए समय से बेहतर बनाए, हमारी कमियों को माफ़ करे, हमारे नेक अमल को स्वीकार करे, हमारे दिलों को सुकून दे, हमें अपनी पसंद के रास्ते पर चलाए और अपनी असीम रहमत से हमें जन्नत अता फ़रमाए। आमीन।
मंज़िल: आख़िरत
थकान: दुनिया की ज़िंदगी
उम्मीद: अल्लाह की रहमत
अंतिम गंतव्य: जन्नत, इंशाअल्लाह
⸻
Comments
Post a Comment