मौत के बाद नेत्रदान कर मिशाल बने बेतिया के कोड़ाई महतो"नेत्रदान जीवन दान"फैसला किया।
बेतिया, बिहार।
मृत्यु उपरांतअपनेअंग का दान करना,जीवन दान कहलाता है।नेत्रदान, रक्तदान,जीवनदान की
प्रक्रिया से जूझनाआसान बात नहीं है,यह बहुत कठिन घड़ी होती है,इस अवसर पर मृतक के परिवार,पत्नी,बेटा,बेटी,
पत्तूहु केअलावा सगे संबंधी,इष्टमित्र,ग्रामीण की भूमिकाअहम होती है।
सिख धर्म में संवाददाता को पता चला है कि पीएमसीएच पटना में कोड़ाई महतो,उम्र 60 वर्ष की मृत्यु इलाज के दौरान हो गई।उनके बेटे,बेतिया निवासी,जितेंद्र महतो ने अस्पताल में ही यह फैसला लिया कि पिता के नेत्र को नेत्रदान करना है,जो दूसरों के लिए एक मिसाल बन गया।आई बैंक टीम के ऋषिकेश,गोनू झा के काउंसलिंग के बाद जितेंद्र महतो ने यह बड़ा फैसला लिया इसके बाद डॉक्टर शुभम और डॉक्टर पूजा ने इमरजेंसी ओटी में कॉर्निया रीट्रीवल किया। जितेंद्र महतो मजदूरी का काम करते हैं,उनके दिमाग में यह प्रश्नआया कि पिता की मृत्यु के बाद इनका नेत्र को दान करके दूसरों कोअंधी जिंदगी को रोशनी देंगे,जो
अंधेपन का पीड़ा झेल रहा है।उन्होंने संवाददाता को बताया कि किसी की जिंदगी खत्म होने के बाद भी उसकाअंग किसी दूसरे के जीवन को नई रोशनी दे सकता है। इसके लिए जितेंद्र महतो को सम्मानित करते हुए मच अधीक्षक डॉक्टर राजीव कुमार सिंह ने संवाददाता को बताया के नेत्रदान और अंगदान को लेकर समाज में आज भी कई तरह के भ्रम और अंधविश्वास है,इन्हें दूर करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी बनती है। पीएमसीएच पटना के आई लगातार नेतरदान के प्रति लोगों को जागरुक करते रहा है। उन्होंने आगे बताया किअभी तक इस प्रक्रिया में 403 लोगों को रोशनी मिल चुकी है,साथ ही 423 व्यक्तिअभी भी इसके इंतजार में है,ऐसे में कोडाई महत्व जैसे व्यक्ति का नेत्रदान उन मरीजों के लिए जीवनदान बन सकता है, जो फिर से दुनिया देखने की ललक रखता है।
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