वे चाहते हैं कि हम एक-दूसरे से नफ़रत करें—हमें उन्हें कामयाब नहीं होने देना है।
पटना, बिहार।
वरिष्ठ कॉरपोरेट प्रोफेशनल एवं सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता रेयाज़ आलम ने भारतीय नागरिकों से धर्म, संप्रदाय, भाषा, जाति या राजनीतिक विचारधारा के आधार पर समाज को बाँटने की हर कोशिश को खारिज करने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत हमेशा से उसकी विविधता को स्वीकार करते हुए एक राष्ट्र के रूप में एकजुट रहने की क्षमता रही है। समाज में बढ़ते सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए आलम ने कहा कि आस्था, भाषा, संस्कृति और विचारधारा में अंतर कभी भी नागरिकों के बीच नफ़रत का कारण नहीं बनना चाहिए।“वे चाहते होंगे कि हम एक-दूसरे से नफ़रत करें, लेकिन हमें उन्हें कामयाब नहीं होने देना है। भारत की वास्तविक ताकत हर किसी को एक जैसा बनाने में नहीं, बल्कि हमारी भिन्नताओं का सम्मान करते हुए गरिमा के साथ साथ रहने में है।” उन्होंने कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि बहुलवाद, सह-अस्तित्व, भाईचारे और पारस्परिक सम्मान पर आधारित एक असाधारण सभ्यतागत विचार है। “भारत सदियों से विभिन्न धर्मों, समुदायों, भाषाओं और परंपराओं के लोगों का घर रहा है। हमारी विविधता कोई समस्या नहीं है जिसे हल किया जाए; यह हमारी ऐसी विरासत है जिसकी रक्षा की जानी चाहिए।”राजनीति का काम जोड़ना हो, बाँटना नहीं। आलम ने राजनीति में पहचान, धर्म और सामाजिक विभाजनों के बढ़ते इस्तेमाल पर चिंता व्यक्त की। “राजनीति में प्रतिस्पर्धा विचारों, विकास, रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय और नागरिक कल्याण के मुद्दों पर होनी चाहिए। राजनीति ऐसी नहीं होनी चाहिए जो पड़ोसी को पड़ोसी के खिलाफ और नागरिक को नागरिक के खिलाफ खड़ा कर दे। नफ़रत से पैदा होने वाली सामाजिक तबाही की कीमत पर कोई भी राजनीतिक जीत सार्थक नहीं हो सकती।” उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनावों और संस्थाओं के सहारे जीवित नहीं रह सकता; इसके लिए नागरिकों के बीच विश्वास, सहिष्णुता, भाईचारा और संवैधानिक मूल्यों के प्रति सम्मान भी आवश्यक है। आस्था प्रेम सिखाए, नफ़रत नहीं।धर्म के संदर्भ में आलम ने कहा कि सच्ची आस्था मनुष्य के भीतर विनम्रता, करुणा और जिम्मेदारी की भावना पैदा करनी चाहिए। “हर धर्म इंसान को एक बेहतर और अधिक करुणामय दुनिया बनाने की प्रेरणा देता है। धर्म कभी भी किसी दूसरे इंसान को अपमानित करने का हथियार नहीं बनना चाहिए। हमें अपने धर्म पर गहरा गर्व हो सकता है, लेकिन साथ ही हमें दूसरे की आस्था और गरिमा का भी सम्मान करना चाहिए।” उन्होंने धार्मिक नेताओं, जनप्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों, मीडिया संस्थानों और नागरिक समाज से समुदायों के बीच पुल बनाने में अधिक प्रभावी भूमिका निभाने की अपील की। “भारत को नफ़रत पर इंसानियत को चुनना होगा” आलम ने विशेष रूप से युवाओं से अपील की कि वे सुनियोजित नफ़रत और भ्रामक सूचनाओं के शिकार न बनें। “हमें अपने बच्चों को सिखाना होगा कि असहमति दुश्मनी नहीं है, विविधता विभाजन नहीं है और देशभक्ति के लिए किसी दूसरे समुदाय से नफ़रत करना आवश्यक नहीं है। हमारे सपनों का भारत ऐसा भारत होना चाहिए जहाँ हर नागरिक स्वयं को समान रूप से सम्मानित, समान रूप से सुरक्षित और समान रूप से महत्वपूर्ण महसूस करे।” उन्होंने कहा कि एकता का संदेश केवल पोस्टरों, भाषणों या सोशल मीडिया अभियानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे जीवन जीने का तरीका बनना चाहिए। “हमारी जन्मभूमि पृथ्वी है। हमारी जाति मानवता है। हमारी राजनीति स्वतंत्रता होनी चाहिए। और हमारा धर्म अंततः हमें प्रेम की ओर ले जाने वाला होना चाहिए।” अपने वक्तव्य के अंत में आलम ने कहा:“आइए, असहमति रखें लेकिन एक-दूसरे के दुश्मन न बनें। बहस करें, लेकिन एक-दूसरे को अमानवीय न बनाएं। अपनी पहचान का उत्सव मनाएं, लेकिन किसी और की पहचान को कमतर किए बिना। जो लोग भारत को बाँटना चाहते हैं, उनका अपना एजेंडा हो सकता है—लेकिन वे कामयाब होंगे या नहीं, यह अंततः हमारे हाथ में है।”
#WeAreOne 🇮🇳
जारीकर्ता:
रेयाज़ आलम
Alumnus, IIM Calcutta & Aligarh Muslim University
Senior Corporate Professional | Social & Human Rights Activist
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