सर सैयद के तालीमी मिशन को आगे बढ़ाना ही सच्ची ख़िराज-ए-अक़ीदत है — महबूब सईद हारिस

हामिद अली एजुकेशनल ट्रस्ट के ज़ेरे-ए-एहतिमाम सर सैयद डे का इनइक़ाद, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के साबिका तलबा को सर सैयद अवार्ड से नवाज़ा गया।
सेराज अहमद कुरैशी
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।
अज़ीम मुफक्किर, माहिर-ए-तालीम, मोहसिन-ए-मिल्लत, बानी-ए-मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज और जदीद तालीम के अलमबरदार सर सैयद अहमद ख़ाँ के 209वें यौम-ए-पैदाइश के मौक़े पर हामिद अली एजुकेशनल ट्रस्ट, गोरखपुर के ज़ेरे-ए-एहतिमाम ‘सर सैयद डे’ का इनइक़ाद किया गया। इस मौक़े पर तालीम, इल्मी बेदारी, साइंसी शऊर और समाजी इस्लाह के मैदान में सर सैयद अहमद ख़ाँ की बेमिसाल ख़िदमात को याद करते हुए उनके तालीमी मिशन को आगे बढ़ाने का अज़्म किया गया। प्रोग्राम दो सेशनों पर मुश्तमिल था। पहले सेशन में मुख़्तलिफ़ स्कूलों के तलबा व तालिबात ने सर सैयद की इल्मी व अदबी ख़िदमात पर अपने ख़यालात का इज़हार किया, जबकि दूसरे सेशन में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के साबिका तलबा को उनकी तालीमी व समाजी ख़िदमात के एतराफ़ में सर सैयद अवार्ड से नवाज़ा गया।
सर सैयद अहमद ख़ाँ की शख़्सियत हिंदुस्तानी तारीख़ में इल्मी बेदारी, तालीमी इस्लाह और समाजी तरक़्क़ी की एक रौशन मिसाल है। उन्होंने ऐसे दौर में तालीम की अहमियत को उजागर किया, जब हिंदुस्तानी समाज का एक बड़ा हिस्सा जदीद साइंसी उलूम और नए इल्मी नज़रियात से दूर था। सर सैयद ने महसूस किया कि किसी भी क़ौम की तरक़्क़ी सिर्फ़ माज़ी के गौरवशाली कारनामों पर फ़ख़्र करने से मुमकिन नहीं, बल्कि इसके लिए इल्म, तहक़ीक़, तर्क, साइंसी सोच और बदलते ज़माने के तक़ाज़ों को समझना ज़रूरी है।
उन्होंने तालीम को महज़ नौकरी हासिल करने का ज़रिया नहीं, बल्कि इंसानी शख़्सियत की तामीर, समाजी इस्लाह, ख़ुद-एतमादी और क़ौमी तरक़्क़ी की बुनियाद क़रार दिया। उनका यक़ीन था कि जब तक नौजवानों को जदीद उलूम, साइंसी फ़िक्र और आला तालीम के मौक़े फ़राहम नहीं किए जाएंगे, तब तक समाज को तरक़्क़ी की नई मंज़िलों तक पहुँचाना मुश्किल होगा।
सर सैयद की तालीमी तहरीक का सबसे अहम पहलू यह था कि उन्होंने तालीम को एक इज्तिमाई ज़िम्मेदारी के तौर पर पेश किया। उन्होंने लोगों को इस बात की तरफ़ मुतवज्जेह किया कि अपने बच्चों, ख़ास तौर पर नौजवान नस्ल को इल्म से आरास्ता करना ही मुस्तक़बिल को बेहतर बनाने का सबसे मज़बूत रास्ता है।
सर सैयद अहमद ख़ाँ की तालीमी जद्दोजहद का एक नुमायाँ पड़ाव 1875 में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल स्कूल का क़याम था, जो बाद में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज बना। उनकी कोशिशों और तालीमी ख़्वाबों की यह तहरीक आगे चलकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की सूरत में एक अज़ीम इल्मी मरकज़ बनी।
अलीगढ़ तहरीक ने हिंदुस्तानी मुसलमानों में जदीद तालीम के फ़रोग़, इल्मी बेदारी और समाजी इस्लाह की नई राहें खोलीं। इस तहरीक का मक़सद ऐसा तालीमी माहौल पैदा करना था, जिसमें मज़हबी व अख़लाक़ी तरबियत के साथ-साथ साइंस, टेक्नोलॉजी, अदब, सियासत, क़ानून और दीगर जदीद उलूम को भी अहमियत दी जाए।
सर सैयद ने 1864 में ग़ाज़ीपुर में साइंटिफ़िक सोसाइटी क़ायम की। इस इदारे का मक़सद जदीद साइंसी और इल्मी किताबों के तर्जुमे के ज़रिए नए उलूम को हिंदुस्तानी ज़बानों में आम करना था। यह क़दम इस बात की दलील था कि सर सैयद तालीम को महदूद तबक़े तक रखने के बजाय उसे आम लोगों तक पहुँचाना चाहते थे। उनकी तहरीक ने यह पैग़ाम दिया कि इल्म की कोई सरहद नहीं होती और दुनिया में होने वाली नई तहक़ीक़ात व साइंसी तरक़्क़ी से वाक़िफ़ रहना हर समाज के लिए ज़रूरी है। आज जब दुनिया आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल टेक्नोलॉजी, मेडिकल साइंस और नई इजादात के दौर से गुज़र रही है, सर सैयद की यह फ़िक्र पहले से कहीं ज़्यादा अहमियत रखती है।
सर सैयद अहमद ख़ाँ की तालीमी फ़िक्र आज भी नौजवानों, तलबा, असातिज़ा, वालिदैन और समाजी रहनुमाओं के लिए मशअल-ए-राह है। तालीम इंसान को सिर्फ़ पढ़ना-लिखना नहीं सिखाती, बल्कि उसे सही और ग़लत में फ़र्क़ करने, सवाल उठाने, दलील के साथ बात करने और ज़िम्मेदार फ़ैसले लेने की सलाहियत भी देती है।
एक तालीमयाफ़्ता समाज में इंसाफ़, भाईचारा, बराबरी, साइंसी मिज़ाज और जम्हूरी शऊर को फ़रोग़ मिलता है। तालीम लोगों को अपने हुक़ूक़ और फ़राइज़ से आगाह करती है और उन्हें समाज की बेहतरी में अपना किरदार अदा करने के क़ाबिल बनाती है।
आज ज़रूरत इस बात की है कि बच्चों को किताबी तालीम के साथ अमली हुनर, कंप्यूटर, साइंस, रिसर्च, डिजिटल जानकारी और रोज़गार से जुड़ी सलाहियतें भी सिखाई जाएँ। ख़ास तौर पर मआशी तौर पर कमज़ोर तबक़ों के बच्चों को आला तालीम के बेहतर मौक़े, स्कॉलरशिप, लाइब्रेरी, डिजिटल संसाधन और रहनुमाई फ़राहम करना वक़्त की अहम ज़रूरत है।
सर सैयद का पैग़ाम यही था कि क़ौमों की तक़दीर तालीमी बेदारी से बदलती है। अगर नौजवान इल्म को अपनी ताक़त बना लें और समाज तालीम के फ़रोग़ को अपनी सामूहिक ज़िम्मेदारी समझे, तो तरक़्क़ी के नए रास्ते खुल सकते हैं।
प्रोग्राम के पहले सेशन में ‘सर सैयद अहमद ख़ाँ, जदीद तालीम के हामी’ के उनवान से तक़रीरी मुक़ाबले का इनइक़ाद किया गया। इसमें गोरखपुर शहर के मुख़्तलिफ़ स्कूलों के तलबा व तालिबात ने शिरकत की। मुक़ाबले के दौरान बच्चों ने सर सैयद अहमद ख़ाँ की इल्मी, अदबी, तालीमी और इस्लाही ख़िदमात के मुख़्तलिफ़ पहलुओं पर रोशनी डाली।
मुक़र्रिरीन ने कहा कि सर सैयद ने तालीम को समाजी बेदारी और तरक़्क़ी का ज़रिया बनाया। उन्होंने अपने दौर में जदीद उलूम के हुसूल की जो अहमियत बयान की, वह आज भी उतनी ही मौज़ूँ है। तलबा ने इस बात पर ज़ोर दिया कि नई नस्ल को सर सैयद के अफ़कार से वाक़िफ़ कराना और उनमें इल्म हासिल करने का शौक़ पैदा करना बेहद ज़रूरी है।
तक़रीरी मुक़ाबले में मियाँ साहब इस्लामिया इंटर कॉलेज के अब्दुल अय्यान ने पहली पोज़ीशन हासिल की, जबकि जेएसएफ की अफ़ीफ़ा रहमान ने दूसरी और इस्लामिक एकेडमी की मारिया निसार ने तीसरी पोज़ीशन हासिल की। कामयाब तलबा व तालिबात की हौसला-अफ़ज़ाई करते हुए उनकी मेहनत, तैयारी और तक़रीरी सलाहियतों की सराहना की गई।
प्रोग्राम के दूसरे सेशन में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के साबिका तलबा को सर सैयद अहमद ख़ाँ के तालीमी मिशन को आगे बढ़ाने और मुख़्तलिफ़ शोबों में नुमायाँ तालीमी व समाजी ख़िदमात अंजाम देने के एतराफ़ में सर सैयद अवार्ड पेश किए गए।
इस मौक़े पर जनाब सैयद नौशाद अली सब्ज़पोश, प्रोफ़ेसर इरशाद अहमद, इंजीनियर शम्स अनवर, डॉक्टर मुनव्वर और जनाब अख़लाक़ अहमद को एजाज़ से नवाज़ा गया। अवार्ड के ज़रिए उनकी ख़िदमात का एतराफ़ करने के साथ-साथ समाज में इल्म, अख़लाक़, ख़िदमत और तालीमी बेदारी को फ़रोग़ देने का पैग़ाम भी दिया गया।
प्रोग्राम में इस बात को अहमियत दी गई कि तालीमी इदारों से फ़ारिग़ होने वाले अफ़राद की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ अपनी ज़ाती तरक़्क़ी तक महदूद नहीं रहती, बल्कि उन्हें अपने तजुर्बे, सलाहियत और इल्मी सरमाये से समाज की रहनुमाई में भी हिस्सा लेना चाहिए। साबिका तलबा अपनी तालीमी और पेशेवर महारत को नई नस्ल तक पहुँचाकर सर सैयद की तहरीक को मज़बूती दे सकते हैं।
इस मौक़े पर हामिद अली एजुकेशनल ट्रस्ट के सेक्रेटरी महबूब सईद हारिस ने कहा कि सर सैयद अहमद ख़ाँ की तालीमी तहरीक महज़ एक इदारे के क़याम तक महदूद नहीं थी, बल्कि यह एक जामे फ़िक्री और समाजी तहरीक थी। इसका बुनियादी मक़सद मिल्लत और समाज को जदीद उलूम, साइंसी फ़िक्र और तालीमी शऊर से आरास्ता करना था। उन्होंने कहा कि सर सैयद ने अपने दौर में तालीम की जो शमा रौशन की, उसकी रोशनी आज भी हमारी रहनुमाई कर रही है। सर सैयद के तालीमी मिशन को आगे बढ़ाना ही उनके लिए सच्ची ख़िराज-ए-अक़ीदत है। उन्हें याद करने का सबसे बेहतर तरीक़ा यह है कि हम उनके अफ़कार को अपनी ज़िंदगी में अपनाएँ, बच्चों को तालीम के बेहतर मौक़े दें और समाज के महरूम तबक़ों तक इल्म की रोशनी पहुँचाने की कोशिश करें।
महबूब सईद हारिस ने कहा कि नई नस्ल को सर सैयद के अफ़कार व नज़रियात से रूशनास कराना और तालीम के फ़रोग़ के लिए अमली इक़दामात करना वक़्त की अहम ज़रूरत है। तलबा में किताबों के मुतालए का शौक़, साइंसी मिज़ाज, तहक़ीक़ी सलाहियत और समाजी ज़िम्मेदारी पैदा करना हम सबका फ़र्ज़ है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि तालीमी बेदारी को सिर्फ़ तक़रीरों और तक़रीबात तक महदूद नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे ज़मीनी सतह पर ऐसे कामों से जोड़ना चाहिए जिनसे ज़रूरतमंद बच्चों को फ़ायदा पहुँचे। सदारती ख़िताब में प्रोफ़ेसर इरशाद अहमद ने कहा कि सर सैयद अहमद ख़ाँ का सियासी शऊर इस फ़िक्र पर मबनी था कि सियासी क़ुव्वत और इज्तिमाई बेदारी की बुनियाद जदीद उलूम और साइंसी तालीम पर इस्तेवार होती है। उनके नज़दीक किसी समाज की मज़बूती के लिए ज़रूरी है कि उसके अफ़राद इल्म हासिल करें, दुनिया के हालात को समझें और तर्क व दलील की बुनियाद पर अपनी राय क़ायम करें। उन्होंने बताया कि सर सैयद ने 1864 में ग़ाज़ीपुर में साइंटिफ़िक सोसाइटी क़ायम की, जिसका मक़सद जदीद साइंसी उलूम और मग़रिबी इल्मी सरमाये को हिंदुस्तानी ज़बानों में मुन्तक़िल करके आम लोगों तक पहुँचाना था। बादअज़ाँ 1875 में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल स्कूल क़ायम किया गया, जो तरक़्क़ी करते हुए मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज बना और बिलआख़िर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की सूरत में एक अज़ीम इल्मी मरकज़ बन गया।
प्रोफ़ेसर इरशाद अहमद के मुताबिक़ सर सैयद की तालीमी तहरीक का असल मक़सद लोगों को नए इल्मी नज़रियात से जोड़ना और उनमें तालीम के ज़रिए तरक़्क़ी का शऊर पैदा करना था। आज भी उनके अफ़कार हमें यह सबक़ देते हैं कि तालीम को बदलते ज़माने के तक़ाज़ों के मुताबिक़ आगे बढ़ाया जाए और हर बच्चे को सीखने व आगे बढ़ने का मौक़ा मिले।
जनाब ज़मीर अहमद पयाम ने कहा कि अगर सर सैयद ने हमें इल्म की रोशनी न दिखाई होती तो न जाने हम कहाँ होते। उन्होंने सर सैयद की याद में ये अशआर पेश किए—
“आसमाँ वाले से बहुत फ़रियाद करेगी दुनिया,
हम न होंगे तो बहुत याद करेगी दुनिया।”
उन्होंने कहा कि सर सैयद अहमद ख़ाँ की जद्दोजहद का बुनियादी मक़सद मुसलमानों को ज़माने के बदलते हुए तक़ाज़ों से हमआहंग करना, उनमें तालीमी बेदारी पैदा करना और उन्हें जदीद उलूम के ज़रिए तरक़्क़ी की राह पर गामज़न करना था। उन्होंने कहा कि सर सैयद ने इल्म को समाजी तब्दीली का मज़बूत ज़रिया बनाया। उनके अफ़कार आज भी हमें याद दिलाते हैं कि तालीम के बग़ैर तरक़्क़ी का सफ़र अधूरा है। नई नस्ल को उनके इल्मी कारनामों से वाक़िफ़ कराना और तालीम को हर घर तक पहुँचाने की कोशिश करना वक़्त की अहम ज़रूरत है। 
मारूफ़ सहाफ़ी और अफ़साना निगार जनाब अब्दुल बाक़ी ख़ाँ हासिल ने बताया कि प्रोग्राम के इनइक़ाद का बुनियादी मक़सद सर सैयद अहमद ख़ाँ की तालीमी ख़िदमात को ख़िराज-ए-तहसीन पेश करने के साथ-साथ नई नस्ल में इल्मदोस्ती, साइंसी शऊर और तालीम के तईं मुस्बत रुजहान पैदा करना था। उन्होंने कहा कि तलबा के दरमियान तक़रीरी मुक़ाबले का इनइक़ाद उन्हें अपनी बात बेहतर अंदाज़ में पेश करने, तारीख़ से सीखने और इल्मी मौज़ूआत पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र करने का मौक़ा फ़राहम करता है। वहीं अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के साबिका तलबा की पज़ीराई के ज़रिए उनकी ख़िदमात को तस्लीम करने और सर सैयद की तालीमी रिवायत को आगे बढ़ाने के अज़्म का इज़हार किया गया। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रोग्राम समाज में तालीम की अहमियत को उजागर करने, नई नस्ल को इल्मी शख़्सियात से मुतआरिफ़ कराने और तालीमी इदारों के दरमियान बेहतर राब्ते क़ायम करने में अहम किरदार अदा करते हैं।
सर सैयद अहमद ख़ाँ की ज़िंदगी हमें यह सिखाती है कि किसी भी समाज की तरक़्क़ी के लिए तालीम, तहक़ीक़, अमली कोशिश और दूरअंदेशी बुनियादी अहमियत रखते हैं। उन्होंने अपने दौर की मुश्किलात के बावजूद तालीम के फ़रोग़ के लिए लगातार जद्दोजहद की और एक ऐसी तहरीक की बुनियाद रखी जिसने आने वाली नस्लों पर गहरे असरात मुरत्तब किए।
आज सर सैयद डे मनाने का असल मक़सद भी यही होना चाहिए कि तालीम से महरूम बच्चों तक किताबें पहुँचाई जाएँ, ज़रूरतमंद तलबा की मदद की जाए, लड़के और लड़कियों को आला तालीम के बराबर मौक़े दिए जाएँ और स्कूलों व कॉलेजों में साइंसी सोच, तहक़ीक़ और अख़लाक़ी तरबियत को फ़रोग़ दिया जाए।
तालीम जब इंसान को इंसान से जोड़ती है, समाज में भाईचारा पैदा करती है और लोगों को दूसरों के हुक़ूक़ का एहतराम करना सिखाती है, तभी उसका असल मक़सद पूरा होता है। सर सैयद का तालीमी मिशन भी इसी वसीअ सोच का आईना है। उनकी याद में होने वाली हर तक़रीब उस वक़्त ज़्यादा मानीख़ेज़ बनती है, जब उससे इल्म की तलब, समाजी ज़िम्मेदारी और अमली ख़िदमत का नया जज़्बा पैदा हो।
सर सैयद डे के मौक़े पर जनाब जमाल, क़ाज़ी तौस्सुल हुसैन, डॉ. अज़ीज़ रिज़वी, ज़फ़र अहमद ख़ाँ, मसरूर जमाल, मुहम्मद अनवर ज़िया, मुहम्मद इब्राहीम, एहतेशाम अफ़सर, एमएसआई इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल मुख़्तार अहमद, इंडियन जर्नलिस्ट एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सेराज अहमद कुरैशी, हसन जमाल उर्फ़ बबुआ भाई, सैय्यद रेहान, इक़बाल अहमद और मोहम्मद आतिफ़ के अलावा मुख़्तलिफ़ स्कूलों के तलबा व तालिबात और उनके असातिज़ा मौजूद रहे।
प्रोग्राम ने सर सैयद अहमद ख़ाँ की तालीमी ख़िदमात को याद करने के साथ-साथ यह पैग़ाम दिया कि इल्म की रोशनी को हर घर तक पहुँचाना, नई नस्ल की सलाहियतों को निखारना और समाज को तालीमी तौर पर मज़बूत बनाना हम सबकी साझा ज़िम्मेदारी है। सर सैयद के तालीमी मिशन को आगे बढ़ाने का यही अमली रास्ता है और यही उनके लिए सच्ची ख़िराज-ए-अक़ीदत भी है।

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