जब गांधी का भारत उसी भारत जैसा दिखने लगे, जिसके खिलाफ गांधी लड़े थे।
गांधी जयंती पर असली सवाल यह नहीं कि हम गांधी को याद करते हैं या नहीं—बल्कि यह है कि क्या हम आज भी उनके मूल्यों को याद रखते हैं।
पटना, बिहार।
हर वर्ष 2 अक्टूबर को देश गांधी की तस्वीरों पर माल्यार्पण करता है, उनके विचारों को उद्धृत करता है और सत्य, अहिंसा तथा शांति की बातें करता है। फिर समारोह समाप्त हो जाते हैं। फूल सूख जाते हैं। भाषण समाप्त हो जाते हैं। हैशटैग गायब हो जाते हैं। लेकिन एक कठिन सवाल वहीं खड़ा रहता है—गांधी का भारत आखिर कहाँ है?
गांधी ऐसे भारत की कल्पना करते थे जहाँ धर्म नफरत नहीं, करुणा सिखाए; जहाँ असहमति का जवाब डर या हिंसा नहीं, संवाद हो; जहाँ सबसे कमजोर नागरिक भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जितना सबसे शक्तिशाली; और जहाँ राजनीतिक सुविधा से ऊपर सत्य का स्थान हो।गांधी का संघर्ष केवल अंग्रेज़ी शासन से मुक्ति के लिए नहीं था। वह एक ऐसे नैतिक भारत के निर्माण का संघर्ष भी था, जहाँ इंसान की गरिमा सर्वोपरि हो। इसीलिए गांधी की प्रासंगिकता उनकी मूर्तियों की संख्या से नहीं, बल्कि हमारे समाज की स्थिति से मापी जानी चाहिए। यहीं आज का सबसे असहज प्रश्न सामने आता है। जिस व्यक्ति ने अहिंसा को साम्राज्य के विरुद्ध शक्ति बनाया, उसी देश में हिंसा और नफरत सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनती दिखाई देती है।
जिस व्यक्ति ने दंगों के बीच जाकर सांप्रदायिक सद्भाव की रक्षा की, उसी देश में धार्मिक पहचान कभी-कभी सामाजिक विभाजन का माध्यम बन जाती है। और जिस गांधी ने असहमति को लोकतांत्रिक जीवन का हिस्सा माना, उसी समाज में सत्ता से सवाल पूछना कई बार विवाद का कारण बन जाता है। गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी। गांधी और गोडसे की विरासत को लेकर बहस आज भी सार्वजनिक जीवन में दिखाई देती है। लेकिन असली सवाल केवल दो ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के बीच चुनाव का नहीं है। असल सवाल दो अलग राजनीतिक दृष्टिकोणों का है। एक कहता है—असहमति नफरत में बदलना जरूरी नहीं। दूसरा विरोधी को दुश्मन बना देता है। एक मानता है कि सत्य सत्ता से बड़ा हो सकता है। दूसरा मानता है कि सत्ता सत्य की परिभाषा बदल सकती है। एक विविधता को स्वीकार करता है। दूसरा भय और विभाजन को राजनीतिक साधन बना सकता है। लोकतंत्र में यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है। गांधी समझते थे कि कोई राष्ट्र अपने अल्पसंख्यकों को असुरक्षित या अपने असहमत नागरिकों को मौन करके शक्तिशाली नहीं बनता। राष्ट्र तब मजबूत होता है जब हर नागरिक को महसूस हो कि उसकी गरिमा, अधिकार और आवाज़ सुरक्षित हैं। गांधी हमें यह नहीं सिखाते कि भारत में सभी लोग एक जैसा सोचें। वह हमें यह सिखाते हैं कि हम अलग सोचते हुए भी एक-दूसरे को नष्ट किए बिना साथ रह सकते हैं। हम सरकारों से असहमत हो सकते हैं। राजनीतिक दलों से असहमत हो सकते हैं। विचारधारा, धर्म और इतिहास पर अलग-अलग मत रख सकते हैं।लेकिन जब असहमति नफरत बन जाती है, तो लोकतंत्र अपनी नैतिक नींव खोने लगता है। और जब नफरत सामान्य हो जाती है, तो हिंसा बहुत दूर नहीं रहती। इसलिए गांधी को केवल 2 अक्टूबर के सरकारी समारोह, मुद्रा या मूर्तियों तक सीमित नहीं किया जा सकता। गांधी एक परीक्षा हैं। सच बोलने की परीक्षा—जब सच असुविधाजनक हो।कमजोर के अधिकारों की रक्षा करने की परीक्षा—भले ही हम उससे सहमत न हों। धर्म को अंतरात्मा और नैतिकता का माध्यम बनाए रखने की परीक्षा—राजनीतिक हथियार नहीं। और सबसे बढ़कर, राजनीतिक हिंसा को अस्वीकार करने की परीक्षा—चाहे वह किसी भी विचारधारा के नाम पर क्यों न हो। आज भारत को एक और औपचारिक गांधी जयंती नहीं, बल्कि एक गांधीय आत्ममंथन की आवश्यकता है। हमें स्वयं से पूछना होगा— क्या हमारी राजनीति अधिक संवेदनशील हो रही है या अधिक आक्रामक? क्या हमारा सार्वजनिक विमर्श अधिक सत्यनिष्ठ हो रहा है या अधिक प्रचार-प्रधान? क्या हमारा समाज अधिक समावेशी हो रहा है या अधिक विभाजित? क्योंकि गांधी को भूल जाने का सबसे बड़ा खतरा यह नहीं कि उनकी तस्वीरें गायब हो जाएँगी। खतरा यह है कि हम उनकी तस्वीरें बचाए रखें, लेकिन उनके मूल्य खो दें। गांधी गोली से मारे गए थे। लेकिन गांधी के विचार गोलियों से नहीं मरते। वे धीरे-धीरे मरते हैं—
जब सत्य समझौता बन जाए,
जब नफरत सम्मान पाने लगे,
जब असहमति खतरनाक हो जाए,
जब धर्म राजनीतिक हथियार बन जाए,
और जब नागरिक सवाल पूछना छोड़ दें।
इस गांधी जयंती पर शायद सबसे सच्ची श्रद्धांजलि एक और माला नहीं, बल्कि एक सवाल है—अगर गांधी आज भारत की सड़कों पर चलते, तो क्या वे उस भारत को पहचान पाते जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन दिया था? इसका उत्तर नेताओं या सरकारों को नहीं देना है। इसका उत्तर हम सबको अपने आचरण से देना है।क्योंकि गांधी का भारत इस बात से तय नहीं होगा कि हम उन्हें कितनी ऊँची आवाज़ में याद करते हैं—बल्कि इस बात से तय होगा कि हम उनके मूल्यों को कितनी हिम्मत से जीते हैं।
— रेयाज़ आलम
Senior Corporate Professional | Social & Human Rights Activist
Alumnus – Aligarh Muslim University & IIM Calcutta
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