हर घर में कम से कम एक अख़बार की नियमित ख़रीदारी और मुताले को मामूल बनाएँ - अबू शहमा अंसारी

उर्दू ज़बान और सहाफ़त की बक़ा के लिए अहले-उर्दू का अमली तआवुन नागुज़ीर।
मोहम्मद उबैद अंसारी 
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश। 
ऑल इंडिया माइनॉरिटीज़ फ़ोरम फ़ॉर डेमोक्रेसी के सेक्रेटरी (नश्र-ओ-इशाअत) अबू शहमा अंसारी ने अख़बारों की मौजूदा सूरतेहाल पर तशवीश का इज़हार करते हुए अहले-उर्दू से अपील की है कि वे हर घर में कम से कम एक अख़बार की नियमित ख़रीदारी और मुताले को मामूल बनाएँ। उनका कहना है कि सहाफ़त की बक़ा और इस्तेहकाम में क़ारईन का अमली तआवुन बुनियादी अहमियत रखता है। ज़बान पढ़ने और समझने वालों की बड़ी तादाद के बावजूद किसी अख़बार की इशाअत एक लाख नुस्ख़ों तक न पहुँच पाना एक संजीदा मामला है, जिस पर अहले-ज़बान और सहाफ़त से वाबस्ता अफ़राद को ग़ौर करना चाहिए।
मौजूदा दौर में सहाफ़त के अंदाज़ और ज़राए तेज़ी से तब्दील हो रहे हैं। नई नस्ल की दिलचस्पियों, बदलते तक़ाज़ों और अवामी मसाइल को पेशे नज़र रखते हुए अख़बारों को भी अपने मवाद और पेशकश में ज़रूरी तब्दीलियाँ लानी होंगी। मक़ामी ख़बरें, अवामी मसाइल, तहक़ीक़ी रिपोर्टें, मुफ़ीद मालूमात और संजीदा तजज़िए क़ारईन को अख़बारों से जोड़ने में अहम किरदार अदा कर सकते हैं। देही इलाक़ों में सड़कों की ख़स्ता हाली, निकासी-ए-आब, साफ़ पानी, बिजली, सेहत और तालीम जैसे बुनियादी मसाइल पर हक़ाइक़ पर मबनी रिपोर्टिंग अवाम की आवाज़ मुताल्लिक़ा इदारों तक पहुँचाने का मुअस्सिर ज़रिया बन सकती है।
सहाफ़त को दरपेश माली और इशाअती मुश्किलात भी तशवीश का बाइस हैं। मुतअद्दिद अख़बार अपनी इशाअत बंद कर चुके हैं, जबकि कुछ ऐसे इदारे जो कभी 12 सफ़हात पर शाया होते थे, अब आठ सफ़हात तक महदूद हो गए हैं। इसी तरह आठ सफ़हात वाले कई अख़बारों की इशाअत घटकर चार सफ़हात तक रह गई है। महदूद वसाइल के बावजूद कुछ इदारे इशाअत का सिलसिला बरक़रार रखने के लिए कोशाँ हैं, ताहम कुछ के मुस्तक़बिल के हवाले से भी अंदेशे पैदा हो गए हैं।
अपनी बात की वज़ाहत करते हुए अबू शहमा अंसारी ने एक वाक़िए का हवाला दिया कि मुंबई में एक वकील के घर काम करने वाली एक अनपढ़ मराठी ख़ातून बाक़ायदा मराठी अख़बार ख़रीदा करती थी। उसका कहना था कि यह हमारी ज़बान का अख़बार है और इसकी इशाअत जारी रहनी चाहिए। उनके मुताबिक़, यह वाक़िया इस हक़ीक़त को वाज़ेह करता है कि अपनी ज़बान से वाबस्तगी सिर्फ़ पढ़ने-लिखने तक महदूद नहीं होती, बल्कि उस ज़बान के सहाफ़ती इदारों के तहफ़्फ़ुज़ में अपना किरदार अदा करना भी इसकी अहम शक्ल है।
नई नस्ल को मुताले और सहाफ़त से जोड़ने में घर और तालीमी इदारों, दोनों की ज़िम्मेदारी अहम है। वालिदैन बच्चों में मुताले की आदत पैदा करें और असातिज़ा अख़बारों के ज़रिए तलबा को ज़बान, समाज और हालात-ए-हाज़िरा से वाक़िफ़ कराएँ। हिंदुस्तान की दूसरी इलाक़ाई ज़बानों के अख़बारों ने भी अपने क़ारईन की बदलती ज़रूरतों को समझते हुए सहाफ़त के नए अंदाज़ अपनाए हैं। मलयालम के ‘मलयाला मनोरमा’ और ‘मातृभूमि’ जैसे अख़बार इस सिलसिले में क़ाबिल-ए-ज़िक्र मिसालें हैं। ज़रूरत इस बात की है कि हमारी सहाफ़त भी अपनी मज़बूत बुनियाद बरक़रार रखते हुए जदीद ज़राए-इबलाग़ और नई नस्ल की तरजीहात से हम-आहंग हो सके।
मेयारी सहाफ़त की तश्कील में सिर्फ़ सहाफ़ती इदारों का किरदार काफ़ी नहीं है। इदारों को अवामी मफ़ाद से वाबस्ता मेयारी और क़ाबिल-ए-एतमाद मवाद फ़राहम करना होगा, जबकि मुदीरान और सहाफ़ियों के लिए तहक़ीक़, पेशेवराना दियानत और सहाफ़ती उसूलों की पासदारी ज़रूरी है। तालीमी इदारे मुताले और तनक़ीदी फ़िक्र को फ़रोग़ दें, अदबी और समाजी तंजीमें मक़ामी सतह पर मुताले की सरगर्मियों को आगे बढ़ाएँ और अहले-क़लम नौजवानों में सहाफ़त और ज़बान के प्रति दिलचस्पी पैदा करने की कोशिश करें।
क़ारईन के किरदार को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अगर अख़बार ख़रीदने वालों की तादाद मुसलसल कम होती जाएगी तो अख़बारों के माली वसाइल भी मुतास्सिर होंगे। इसलिए हर ख़ानदान कम से कम एक अख़बार बाक़ायदा ख़रीदे और पढ़े। बच्चों और नौजवानों को भी इस मुताले में शरीक किया जाए और दोस्तों, रिश्तेदारों तथा पड़ोसियों को अख़बार ख़रीदने की तरग़ीब दी जाए। जो अफ़राद अलग से अख़बार ख़रीदने की इस्तिताअत नहीं रखते, वे बाहमी तआवुन से मुश्तरका तौर पर अख़बार मँगवा सकते हैं या किसी न्यूज़ एजेंट के ज़रिए बाक़ायदा अख़बार हासिल करने का इंतज़ाम कर सकते हैं।
अख़बारों को भी अपने क़ारईन से मज़बूत राब्ता क़ायम रखना चाहिए। अवाम अपने इलाक़े के मसाइल, तजावीज़, आरा और अहम मक़ामी मालूमात अख़बारों तक पहुँचाएँ, ताकि सहाफ़त महज़ ख़बरों की तरसील तक महदूद न रहे, बल्कि समाज के मसाइल की तर्जुमानी का मुअस्सिर ज़रिया बने। क़ारईन की राय और तजावीज़ से इदारों को अपने मवाद और तरजीहात बेहतर बनाने में भी मदद मिल सकती है।
आख़िर में अबू शहमा अंसारी ने अहले-उर्दू से ख़ुसूसी अपील की कि एक अख़बार ख़रीदना सिर्फ़ चंद सफ़हात हासिल करना नहीं, बल्कि अपनी ज़बान, तहज़ीबी शनाख़्त और सहाफ़ती रिवायत के तहफ़्फ़ुज़ में हिस्सा लेना है। अगर क़ारईन आज से अमली तआवुन शुरू कर दें तो सहाफ़त के लिए एक मज़बूत बुनियाद क़ायम की जा सकती है। वक़्त का तक़ाज़ा है कि अख़बारों को सिर्फ़ पसंद करने के बजाय उन्हें ख़रीदकर, पढ़कर और दूसरों तक पहुँचाकर ज़िंदा रखने में अपना किरदार अदा किया जाए।यह प्रेस रिलीज़ ऑल इंडिया माइनॉरिटीज़ फ़ोरम फ़ॉर डेमोक्रेसी के शोबा-ए-नश्र-ओ-इशाअत की जानिब से जारी की गई है।

Comments

Popular posts from this blog

The Robotics and AI Innovation Lab was inaugurated at Carmel Girls' Inter College.

नशा मुक्त भारत अभियान के तहत एक परिचर्चा का आयोजन किया गया।

जो सिफत बाप में होती है कमोबेश वही सिफत औलाद में पाई जाती है - मुफ्ती अकरम