सारी ज़िंदगी सुन्नते मुस्तफ़ा पर चलते रहे हज़रत सूफ़ी निज़ामुद्दीन

सेमरियावा/ संत कबीर नगर, उत्तर प्रदेश।
विश्वविख्यात आलिमे-दीन और महान इस्लामिक विद्वान हज़रत सूफी निज़ामुद्दीन क़ादरी, बरकाती, रज़वी, मुहद्दिस बस्तवी का 14वां सालाना उर्स बेहद अकीदत और एहतराम के साथ मनाया जा रहा है। उर्स के मुबारक मौके पर देश-के विभिन्न प्रांतों से उनके चाहने वाले और मुरीदीन बड़ी संख्या में संत कबीर नगर पहुंच रहे हैं।
 12 अक्टूबर (सोमवार): सुबह फजर की नमाज के बाद मज़ार शरीफ़ पर कुरआन ख्वानी के साथ उर्स की शुरुआत होगी। दोपहर ज़ोहर की नमाज़ के बाद मज़ार पर चादरपोशी और गुलपोशी का सिलसिला शुरू होगा, जो देर शाम तक चलेगा।
  रात में इशा की नमाज के बाद भव्य 'निज़ामी कान्फ्रेंस' का आयोजन किया जाएगा। यह कांफ्रेंस हजरत अल्लामा सूफी मोहम्मद हबीबुररहमान रज़वी (सज्जादा नशीन, खानकाहे निज़ामिया, अगया शरीफ) के संरक्षण और मौलाना जिया उल मुस्तफा निजामी महासचिव आल इंडिया बज्मे निजामी की अध्यक्षता में होगी। इसमें देश के कई नामवर इस्लामिक विद्वान शिरकत करेंगे।
 13,अक्टूबर (मंगलवार): सुबह 08:00 बजे मज़ार पर 'कुल शरीफ' की दुआ के साथ उर्स के कार्यक्रमों का समापन होगा।
हज़रत सूफी निज़ामुद्दीन क़ादरी का जन्म 15 जनवरी 1928 को संत कबीर नगर ज़िले के अगया गांव में हुआ था। बचपन से ही आप बेहद नेक, सरल स्वभाव और पाकीज़ा मिजाज के थे। छात्र जीवन से ही आपका रुझान इबादत, तक़वा और दीन की खिदमत की तरफ था।
आपकी काबिलियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1952 में आपको जामिया अशरफिया मुबारकपुर में 'दस्तारे फजीलत' से नवाजा गया। आपने देश के चार प्रतिष्ठित मदरसों में अध्यापन कार्य किया और अंत में दारुल उलूम तनवीर-उल-इस्लाम, अमरडोभा में सद्र अल-मुदर्रिस व शेख अल-हदीस के पद पर रहते हुए पूरे 20 साल तक बिना किसी वेतन (लिल्लहियत के साथ) तालीम दी।
हज़रत सूफी साहब की जिंदगी शरीयत और सुन्नत की पैरवी की एक बेमिसाल दास्तान है। उनके जीवन के कई वाकये आज भी लोगों को हैरान और प्रेरित करते हैं:
 अमरडोभा मदरसे में जब मदरसा बोर्ड की रजिस्ट्रार सालेहा रिज़वी निरीक्षण के लिए आईं और प्रिंसिपल साहब से मिलना चाहा, तो आपने संदेश भिजवा दिया कि “मैं गैर-महरिम महिलाओं से नहीं मिलता। मैं यह मदरसा छोड़ सकता हूं, लेकिन शरीयत की खिलाफवर्जी नहीं कर सकता।” जैसे ही वे आपके कमरे के पास आईं, आप अलमारी की तरफ मुंह छिपाकर खड़े हो गए। आपकी यह परहेज़गारी उनकी बुजुर्गी की गवाही देती थी।
 आपके लंदन में रहने वाले पुराने शिष्यों ने आपको कई बार लंदन आने की दावत दी, लेकिन आपने यह कहकर मना कर दिया कि वहां जाने के लिए पासपोर्ट आदि के वास्ते फोटो खिंचवानी पड़ेगी, जिसकी शरीयत में इजाजत नहीं है। इसी एहतियात के चलते आपने दोबारा हज-ए-बैतुल्लाह का सफर भी नहीं किया।
दिन के वक्त आप छात्रों को इल्म की रौशनी से मालामाल करते थे और रात के वक्त समाज सुधार की मग्लीस-ओ-कान्फ्रेंस में हिस्सा लेते थे। कुरआन और हदीस के हवाले से भरे आपके पुरम असर बयानों की वजह से विद्वानों ने आपको 'खतीबुल-बराहीन' के लकब से सम्मानित किया।
समाज सुधार और दीन की रोशनी फैलाने के लिए आपने एक दर्जन से ज्यादा बेहतरीन किताबें लिखीं, जिनमें प्रमुख हैं(1)बरकाते रोज़ा(2)हुकूके वालिदैन(3)मदीना की फ़ज़ीलत(4)फलसफे कुर्बानी(5)बरकाते मिस्वाक(6) दाढ़ी की अहमियत(7)खाने-पीने का इस्लामी तरीका
आपके जीवन और कारनामों पर कई उलेमा व लेखकों ने किताबें लिखी हैं, जैसे— निजामे हसन व मुबीन,
आइना-ए-मुहद्दिस बस्तवी, आलीमे बाअमल, और हयाते खतीब अल-बराहीन आदि।
तकरीबन अपनी पूरी जिंदगी सुन्नते मुस्तफा के साए में गुजारने वाले यह अजीम संत 14 मार्च 2013 को अपने पैतृक गांव अगया में इस दुनिया से रुखसत हो गए। आपके इंतकाल पर देश-विदेश से लाखों की तादाद में श्रद्धालु अंतिम विदाई देने पहुंचे। आज भी हर साल आपका उर्स अकीदत के साथ मनाया जाता है, जहां लाखों लोग हाजिरी देकर रूहानी सुकून हासिल करते हैं।

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