वंदे मातरम् का पाखंड से देश का कल्याण संभव नहीं, देश की अखंडता, स्वतंत्रता पर कुठाराघात।

शहाबुद्दीन अहमद
बेतिया, बिहार।
किसी भी संगठन के द्वारा "वंदे मातरम" पर विशेष तौर पर वावेला मचाना, भारत जैसे लोकप्रिय देश की अखंडता, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय,सबका साथ,सबका विकास, सबका विश्वास जैसे नारों पर कुठाराघात जैसा प्रतीत हो रहा है। जिस "वंदे मातरम्" को लेकर इन दिनोंआरएसएस का पूरा कुनबा खुद को देशभक्त बताते हुए दूसरों की देशभक्ति पर सवाल खडे़ कर रहा है,उस "वंदे मातरम्" की रचना 1875 में हुई थी,उसके 50 साल बाद 1925 में आरएसएस की स्थापना हुई। प्रश्न यह खड़ा होता है कि अगर वह 'वंदे मातरम्' को देशभक्ति से इतना ही ओतप्रोत होकर मानता है तो उसने इसेआरएसएस की प्रार्थना के रूप में क्यों नहीं इसे स्वीकार कर लिया?अलग से 'नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि' को संघ की प्रार्थना क्यों बनाई?
कोई कह सकता है कि देश कीआजादी से पहले ब्रिटिश हुकूमत ने वंदे मातरम को प्रतिबंधित कर दिया था,इसलिए उसे संघ की प्रार्थना नहीं बनाया जा सकता था। इस तर्क को अगर मान भी लिया जाए तो सवाल बनता है कि आरएसएस के कितने स्वयंसेवक 'वंदे मातरम्' का नारा लगाते हुए जेल गए, या कितनों ने अंग्रेजों की लाठियां खाई?इस संदर्भ में
कांग्रेस ने तो 'वंदे मातरम्' को 1996 में हीअपना लिया था,जब उसके अध्यक्ष,रहीमतुल्लाह सयानी थे,उनकी ही अध्यक्षता में कांग्रेस के कलकत्ताअधिवेशन में पहली बार गुरूदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने उसके शुरुआती दो पदों का गायन किया था,उसके बाद पूरे स्वाधीनता संग्राम के दौरान हजारों हजार लोगों ने कांग्रेस के झंडे तले 'वंदे मातरम्' का नारा लगाते हुए पुलिस की लाठियां खाई,जेल गए।इसके बावजूद कांग्रेस के हर अधिवेशन में "वंदेमातरम्" के शुरुआती दो पदों का गायन हुआ।आज भी होता है।देश की आजादी के बाद संविधान सभा ने "वंदे मातरम्" के शुरुआती दो पदों राष्ट्रगीत बनाने की मंज़ूरी दी।सवाल यह भी है कि देशआजाद होने के बादआरएसएस ने "वंदे मातरम्" कोअपनी प्रार्थना के रूप में क्यों नहीं स्वीकार कर लिया?अभी आरएसएस का शताब्दी वर्ष चल रहा है। इस शताब्दी वर्ष में ही क्यों नहीं वह इसेअपनी प्रार्थना के रूप में स्वीकार कर लेता है ? ऐसा करने से कौन उसे रोक रहा है?
केवल देश में इस बिंदु को लेकर वावेला मचाने, आरोप प्रत्यय करने से देश
का विकासअवरुद्ध होगा, 
देश कीअखंडता,संप्रभुता 
स्वतंत्रता,आपसी सौहार्द,
देश प्रेम,कम्युनल हार्मनी 
मानवीय संवेदनाइत्यादि जैसे शब्दों परअंकुश लग जाएगा,देशवासीआपस की
प्रेमभाव,स्नेह,भाईचारगी,
सामाजिक परिवेश पर खतरा मंडराने लगेगा,इस बिंदु पर किसी भी संगठन के द्वारा वावेला मचाना, जबरदस्ती थोपना, जबरदस्ती गाने के लिए मजबूर करना,भारतीय संविधान के अंतर्गत देश की हित में नहीं होगा।

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