तटबंधों के टूटने से पीड़ा भोगने को मजबूर ग्रामीण जानमाल,घर,संपत्ति का नुकसान:-- सुरैयाशहाब
शहाबुद्दीन अहमद
बेतिया, बिहार।
जिला एवं प्रखंडों के अंतर्गत पड़ने वाले तटबंध एवं बांधों की मरम्मत समय रहते नहीं होने से ही बाढ़ काआना निश्चित बन जाता है,इस बात की जानकारी,स्थानीय मानवाधिकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता, सुरैया शहाब ने दी है। उन्होंनेआगे कहा कि जिस गांव की तबाही,बर्बादी हो जाता है,हजारों की संख्या में लोग बर्बाद हो जाते हैं, उनके घरों,जानमाल के अलावा मवेशी,संपत्ति पर आफतआजाती है।तटबंध तो बना दिए गए पर क्या उसकी देखभाल की जवाबदेही तय हुई ?अगर जवाबदेही तय है तो फिर कार्रवाई क्या हुई?टूटने के समय तेज धार में फेंकी गईं मिट्टी,बालू की भारी अधभरी बोरियां संबंधित अधिकारियों,ठेकेदार के ही कामआती हैं।अंततःबांध टूट जाता है,तेजधार के कारण घर,फसलें बर्बाद हो जाती हैं,इसकी सारी की सारी जिम्मेदारी जल संसाधन विभाग की होती है,अगर ये तटबंध नहीं होते तो क्या इतनी सारी बर्बादी होती?नदी का गाद पानी धीरे-धीरे फैलेगा गांव,खेत में जायेगा फिर दो-चार दिनों में लौट जायेगा। तटबंध न हों तो पानी बिजली की तरह बह आएगा,तटबंध नहीं टूटेगा,बाघ की तरह गरज जायेगा,फिर सब कुछ बर्बाद नहीं होगा।इस तबाही से कुछ लोगों को कमाने,कुछ को राहत सामग्री देते तस्वीर को खिंचवाने,अफसर,मिडिया की चहलकदमी,शिक्षकों को छुट्टी,नेताओं कोअपनी राजनीति चमकाने का मौका मिल जाता है।बर्बाद होती हैं फसलें,किसानों के सपने,गरीब की झोपड़ी ।
इस तबाही के कारण हमारी नीतियां,कुप्रबंध भ्रष्टाचार हैं।हमने पहाड़ों, जंगलों में पेड़ों की कटाई कर दी,फिर वर्षा के पानी साथआया गाद नदी में भर गया।गाद हटाने की ठोस योजना बनाने के बदले हिन्दू-मुसलमान का खेल खेल रहे हैं।हम मनुष्य चाहे जितना भेदभाव कर लें, पर नदियां ऐसा नहीं करतीं प्रकृति कभी जीवन सींचने में या विनाश में कोई भेदभाव नहीं करती।
काश!सबसे बुद्धिमान, सुसंस्कृत प्राणी नदियों से, प्रकृति से कुछ सीख लेनी चाहिये,ताकिभविष्य भी सुरक्षित रह सके।प्रत्येक वर्ष बाढ़ काआना,यह प्राकृतिक के साथ-साथ मानवीय गड़बड़ी भी है, इसके पीछे बहुत सारे कारण हैं।रूलिंग राजनीतिक पार्टियों के पदाधिकारीगण,विभागीय पदाधिकारी,सरकारी पदाधिकारी,कर्मचारीगण अभियंता के साथ उनके अभिकर्ता को लूटने का मौका मिल जाता है।केंद्र और राज्य की सरकार ईमानदारीपूर्वक काम करें सभी तटबंधों,बांधों,डेम्प की सुरक्षा,दरार पड़ने के पूर्व इसकी सुरक्षा पर ध्यान दें तो कभी भी बाढ़आने की संभावना नहीं रहेगी। मगर यहां तो मामला दूसरा ही है।कमीशनखोरी का बाजार गर्म है,ऊपर से नीचे तक कमीशनखोर बैठे हुए हैं,100% राशि जो निर्माण के मद मेंआवंटित होती है उसमें से 40% की राशि कमीशन के रूप में पहले ही काट ली जाती है,तो शेष 60% राशि से निर्माण
कैसा होगा,वही होता है कि
साल दो साल के अंदर टूट जाता है,फिर बनाने के लिए राशिआवंटित की जाती है,कमीशन बनता है लूटखसोट जारी रहता है, जबतक कमीशनखोरी नहीं बन्द होगी तब तक तटबंध
टूटता रहेगा,यही सरकार की नीति और नियत है,जो प्रतिवर्ष करोड़ का बजट हड़प कर लिया जाता है।
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